पर्यावरण संरक्षण हेतु सार्थक प्रयास की जरुरत

आजकल पर्यावरण संरक्षण का सवाल सबसे अहम् है। इसका मानव जीवन से सीधा सम्बंध है। न तो इसका नाम नया है और न ही इसकी अवधारणा नयी है। यदि इसके शाब्दिक अर्थ के बारे में विचार करें तो पाते हैं कि एक विषेष आवरण जिसे दूसरे अर्थों में हम प्रकृति का आवरण भी कह सकते हैं। वास्तविक अर्थों में यह एक रक्षा कवच है। 
 तात्पर्य यह कि वह आवरण, वह रक्षा कवच जिसमें हमें आनंद की अनुभूति होती है, पर्यावरण है। इसमें किंचित भी संदेह नहीं है कि सभी धर्मों का अवलम्बन पर्यावरण है। हरेक धर्म का सार पर्यावरण ही तो है। प्रकृति को अलग करके धर्म की कल्पना असंभव है। क्योंकि प्रकृति से ऊपर कोई नहीं है और इसी में हमारा जीवन है, प्राण है। लेकिन विडम्बना है कि इसी प्रकृति की हम निरंतर उपेक्षा कर रहे हैं। अपने स्वार्थ कहें या अपनी आवष्यकताओं की पूर्ति की खातिर हम उसका बेदर्दी से दोहन कर रहे हैं। वह भी बिना यह सोचे कि इसका दुष्परिणाम क्या होगा। जबकि मानव जीवन में जल, जंगल और जमीन की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता। 
यदि इतिहास पर नजर डालें तो प्राचीनकाल से ही वृक्षों के प्रति भारतीय समाज का अनुराग सांस्कृतिक परंपरा के रूप में विकसित हुआ है। इसी परंपरा को जीवंत बनाये रखने हेतु आज से 286 साल पहले 1730 ई. में राजस्थान के खेजड़ली गांव में 363 विश्नोई समुदाय के स्त्री-पुरूषों ने खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा हेतु अपना बलिदान किया था। उनका बलिदान मानव जीवन और पर्यावरण की रक्षा की दिशा में अभूतपूर्व है और चिर-स्मरणीय भी। लेकिन भारत में नेतृत्व की विकास की अवधारणा के फलस्वरूप वनों का ही नहीं, हरे-भरे खेतों का स्थान भी कंक्रीट के जंगलों ने ले लिया। इसकी गाज सबसे पहले वन्य जीवों पर पड़ी। नतीजतन कुछ वन्य जीव जो ‘पंचतंत्र’, ‘जातक कथाओं’ और ‘पौराणिक कथाओं’ के अनुसार कभी देवी-देवताओं के वाहक थे, आज इतिहास और काल के पात्र बनकर रह गए हैं। इसका सर्वाधिक प्रभाव पर्यावरण पर पड़ा।

    दरअसल मानव जगत का पृथ्वी तथा उसके वायुमण्डल से घनिष्ठ सम्बंध है। मनुष्य इसी पृथ्वी पर अपना निवास बनाता है, अनाज पैदा करने से लेकर जंगल से वनस्पति व खनिज का उपयोग करने तथा तमाम कार्यकलापों से वह अपना जीवन-यापन करता है। पृथ्वी तथा वायुमण्डल से मिलकर बना वातावरण जिसे दूसरे शब्दों में ‘पर्यावरण’ कहते हैं; पृथ्वी के भौतिक वातावरण व उसके घटकों से मिलकर बनता है। प्रकृति के सभी घटक निश्चित मात्रा में अपने कार्य करके प्रकृति को स्वच्छ रखते हैं।
 भौतिक वातावरण व उसमें रहने वाले सभी जीव मिलकर पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। लेकिन जब मानवीय हस्तक्षेप प्रकृति के इस सन्तुलित तंत्र में विक्षोभ उत्पन्न करता है तो इसके घातक प्रभाव पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों व मनुष्यों पर पड़ते हैं। इस सन्तुलन को बिगाड़ने में मनुष्य की भूमिका महत्वपूर्ण है। उसी के स्वार्थ ने उसकी विवेकीय शक्तियों पर विजय पाकर उसे तात्कालिक लाभ व सुख सुविधाओं के लिए प्रेरित किया है। परिणामस्वरूप जल, जंगल, जमीन, वायु, नदी सभी प्राकृतिक संसाधन जो मानव जीवन के आधार हैं, प्रदूषित हो गए हैं। इस सबके लिए हम ही दोषी हैं। पाष्चात्य सभ्यता के मोहपाष में बंध अपने खान-पान, आचार-विचार और स्वास्थ्य के प्रति दिन प्रतिदिन लापरवाह होते चले जाना और भौतिक संसाधनों की अंधी दौड़ के चलते प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के प्रति उदासीनता और उनका अंधाधुंध दोहन इसका प्रमुख कारण है। इसके चलते हमने अपनी भावी पीढ़ी का भविष्य ही अंधकार में धकेल दिया है।

        असल में प्राकृतिक संसाधन और उनका उचित उपयोग राष्ट्र को विकसित तथा अनुचित उपयोग गरीब बनाता है। गरीब राष्ट्र के गरीबीग्रस्त भाग में पर्यावरण की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक खराब पायी जाती है। पर्यावरण का चहुंमुखी विकास या संरक्षण तभी सम्भव है, जब ऐसे राष्ट्र या उसके ऐसे भाग में जहां गरीबी का बोलबाला हो, वहां के लोगों को गरीबी के दलदल से निकाला जाये तथा उनके जीवन-स्तर को सुधारा जाये अन्यथा प्रदूषण और गरीबी के दलदल का मिला-जुला रूप एक मीठे जहर के रूप में उभरकर समूचे राष्ट्र में फैलकर अपना असर भयंकर नासूर की तरह दिखाने लगेगा। यही स्थिति हमारे देश की है जहां विकास के मौजूदा ढांचे जिसमें औद्योगिक विकास को प्रमुखता दी गई है, ने समूचे पर्यावरण को प्रदूषित करके रख दिया है और निहित स्वार्थ के चलते हम उसको दिनोंदिन और बढ़ाने में अहम् भूमिका निबाह रहे हैं।
 हकीकत में पर्यावरण प्रदूषण आज व्यापक समस्या बन चुका है। आज यह समस्या देश की ही नहीं,  अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन चुकी है। यही कारण है कि विश्व के तमाम देश गंभीरता से इसका समाधान निकालने में जुटे हैं।  
 गौरतलब है कि हमारे यहां पृथ्वी को उजाड़ने में जो कारक उत्तरदायी हैं, उन पर कभी सोचने का प्रयास ही नहीं किया गया। वर्तमान में पड़ रही भीषण गर्मी और मौसम में आ रहे बदलाव इसका पर्याप्त संकेत दे रहे हैं कि यदि हमने पर्यावरण की रक्षा की गंभीर कोशिशें नहीं कीं तो आने वाले दिन भयावह होंगे। 
औद्योगीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया में घने वन-उपवनों के उजाड़ से पर्यावरण संतुलन काफी हद तक बिगड़ गया है। यह सच है कि औद्योगीकरण के चलते रोजगार के नये अवसर खुले और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई, पर इसका नकारात्मक पहलू यह है कि औद्योगिक विकास ने पर्यावरण को काफी क्षति पहुंचायी। आज उद्योगीकरण और रासायनिकीकरण के चलते हमारी नदियां, समुद्र, जल, भूजल, वायु-सभी के सभी भयावह स्तर तक प्रदूषित हो चुके हैं। कई नदियों का तो अस्तित्व ही मिट गया है। रासायनिक तत्वों के अत्याधिक उपयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति निरंतर घटती जा रही है।

औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषक तत्वों से हमारे प्राकृतिक संसाधन ही नहीं बल्कि समूचा वायुमंडल विषाक्त हो रहा है। कागज के कारखानों से हाइड्रोजन सल्फाइड, ताप बिजलीघरों से सल्फर डाइआक्साइड, तेल शोधक कारखानों से हाइड्रोकार्बन और रासायनिक उर्वरक कारखानों से उत्सर्जित अमोनिया वायुमंडल ही नहीं, नदियों को भी खतरनाक ढंग से प्रदूषित करती है। कार्बन डाईआॅक्साइड से वायुमंडल का ताप बढ़ता है।
 ओजोन में कमी व कार्बन डाईआॅक्साइड में बढ़ोतरी से 2030 तक तापमान दो डिग्री से ज्यादा बढ़ जायेगा। इससे समुद्र व वातावरण में नमी से जल का वाष्पन होगा, ग्लेिषयरों पर जमी बर्फ तेजी से पिघलेगी, समुद्र के पानी में बढ़ोतरी होगी जिससे भीषण तबाही मच सकती है और जलवायु व मौसम में भारी परिवर्तन हो सकता है।

हमारे यहां लोग सबसे पहले उन मुद्दों पर सोचते हैं जो जीवन के लिए अनिवार्य हैं। उस समय जो भी संसाधन उपलब्ध हों, वे चाहे वन, वन्यप्राणी, खनिज पदार्थ हों या कोई अन्य, उसको प्राप्त करने के लिए सबसे पहले पहल की जाती है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण संरक्षण अपना महत्व खो देते हैं। असलियत में पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति के मामले में आम जनता की कोई हिस्सेदारी नहीं है। इसलिए आमजन को जागरूक करने की जरूरत है। इसके बिना इस समस्या पर पार पाना असम्भव है। 
आज समय की महती आवश्यकता है कि हम सभी पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति के प्रति न केवल चिंतित हों बल्कि उसकी रक्षा के लिए कमर कस कर तैयार हों और ऐसी जीवन पद्धति विकसित करें जो हमारे पर्यावरणीय संतुलन को बनाये रखने में सहायक हो। अब हमें इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास करने होंगे, तभी स्थिति में कुछ सुधार संभव है। अन्यथा स्थिति में बदलाव की आशा बेमानी है।