नोटबंदी का कदम और RBI की विश्वसनीयता

Situation before demonetisation

बीते एक दशक के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने स्वतंत्र एवं किफायती मौद्रिक प्राधिकार के रूप में जबरदस्त विश्वसनीयता हासिल की। कई लोग मानेंगे कि वह देश के उन गिनेचुने संस्थानों में से है जिन्हें विश्वस्तरीय करार दिया जा सकता है। हालांकि तकनीकी रूप से वह आरबीआई अधिनियम के तहत सरकार के अधीन है लेकिन एक के बाद एक तमाम गवर्नरों ने प्रभावी स्वायत्तता हासिल की है। इसी ओर

  • अभी हाल ही में वह सरकार के साथ एक समझौते पर पहुंचा है जिसके तहत मौद्रिक नीति के लिए उपभोक्ता महंगाई को एकल लक्ष्य बनाया जाएगा। अब उसके पास अवसर है कि वह अधिक विश्वसनीयता हासिल करे और पारदर्शी नीति निर्माण करे।

यह बात दुर्भाग्यपूर्ण है कि विश्वसनीयता और स्वायत्त संस्था बनने की दिशा में इस प्रगति का अधिकांश हिस्सा विमुद्रीकरण के बाद की कवायद में छीज गया। मुद्रा की स्थिरता की दिशा में प्राथमिक उत्तरदायित्व केंद्रीय बैंक का ही है।

  • इसके बावजूद इस बात में काफी संदेह है कि 500 और 1,000 रुपये की मुद्रा बंद करने का निर्णय आरबीआई के कहने पर लिया गया।
  • गौरतलब है कि ये नोट देश की कुल प्रचलित मुद्रा का 86 फीसदी थे। यह जाहिर तौर पर सरकार का फैसला था जिसमें आरबीआई के बोर्ड की सहमति रही होगी।
  • मुद्रा की स्थिरता बरकरार रखना उसका काम है। मुद्रा की वापसी पर उसकी मूक स्वीकृति से यह स्थिरता कायम करने में क्या मदद मिली यह समझ से बाहर है। अगर उसका तय काम ही पूरा नहीं हो सका तो उसने अपनी सहमति ही क्यों दी? ये प्रश्न आरबीआई की स्वायत्तता और विश्वसनीयता से प्रत्यक्षत: संबंधित हैं। इनका जवाब कहीं अधिक पारदर्शिता के साथ दिया जाना चाहिए। 
  • आरबीआई ने विमुद्रीकरण की कवायद की तार्किकता को लेकर क्या अनुमान लगाए थे और इस दिशा में क्या प्रगति हुई। देश के मौद्रिक इतिहास की इस एक अत्यंत अहम घटना को अंजाम देने में आरबीआई की कोई प्रत्यक्ष या सार्वजनिक भूमिका सामने नहीं आई।

 उसने नोटबंदी  प्रक्रिया में एक के बाद एक कई विरोधाभासी परिपत्र अवश्य जारी किए। इस स्थिति को जारी नहीं रहने दिया जा सकता है। इस सिलसिले में और अधिक सूचना की आवश्यकता है। दुख की बात यह है कि हर सप्ताह बैंकों में जमा हो रही नकदी जैसी मूलभूत जानकारी तक सामने नहीं आ पा रही है। जब यह जानकारी पूरी पारदर्शिता से उपलब्ध रहा करती थी। इक्कीसवीं सदी के केंद्रीय बैंक का सबसे पहला और अहम काम है पारदर्शिता। इस दृष्टि से देखा जाए तो इसमें दो राय नहीं कि आरबीआई विफल रहा है। 

क्या अतीत में ऐसा हुआ है

यह सच है कि अतीत में आरबीआई ने ऐसे कई निर्णय लिए हैं जिन्होंने तत्कालीन सरकार को सांत्वना प्रदान की है। पिछले गवर्नरों ने भी अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद संबंधित दबाव के बारे में बात की है जो उन पर पड़ता रहा। लेकिन मौजूदा निर्णय जैसा कोई निर्णय कभी नहीं लिया गया।

हाल का कदम और RBI के कार्यान्वयन पर प्रश्नचिह्न

सरकार और आरबीआई के बीच इस स्तर की मिलीभगत भी इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली। इसमें शक नहीं कि हालिया दशकों में आरबीआई इतना कमजोर इससे पहले कभी नजर नहीं आया। उसे अब अपनी प्रतिष्ठा बचाने की दिशा में काम करना चाहिए और एक बार फिर यह दिखाना चाहिए कि वह एक स्वायत्त संस्था है। अगर वह विमुद्रीकरण को लेकर अपनी संस्थागत स्थिति स्पष्ट कर देता है तो यह बेहतर होगा। उसे इस बात की पारदर्शी तरीके से जांच करनी चाहिए कि विमुद्रीकरण की प्रक्रिया ने बैंकिंग क्षेत्र पर किस कदर दबाव डाला। उसे यह भी बताना चाहिए कि आने वाले महीनों में बैंक ऋण इससे किस प्रकार प्रभावित होगा। विश्वसनीयता दोबारा हासिल करने की राह आसान नहीं है लेकिन आरबीआई को शुरुआत करनी चाहिए।

साभार : business standard