भारत में आपदा प्रबंधन : कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) की रिपोर्ट

=>​भारत में संभावनाएं ज्यादा 
- भारत, दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां प्राकृतिक आपदाओं का खतरा यहां की 1.2 अरब आबादी पर मंडराता रहता है। देश के कई इलाके तो इस लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं, इसके बावजूद देश का आपदा प्रबंधन बेहद खराब स्थिति में है।

- आपदा प्रबंधन पर आई कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक 2006 में नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीएमए) का गठन किया गया था, लेकिन इसके पास न तो उचित सूचनाएं होती हैं, न ही एक्शन कंट्रोल।

- सीधे शब्दों में कहें तो प्राकृतिक आपदा से निपटने में यह पूरी तरह फेल साबित हुआ है। इसके कारणों को खंगालते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि ढांचागत व्यवस्थाएं होने के बावजूद कम्यूनिकेशन में कमी इसका सबसे बड़ा लूप होल है। इसकी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कैपेसिटी प्रभावी नहीं होने के कारण कोई प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाता। इसके कारण न तो आपदा के पूर्व संकेत जुटाए जाते हैं, न ही बचाव व राहत कार्यों की सही समय पर शुरुआत हो पाती है। 

  • अापदाओं की बारंबारता की स्तिथि भारत में है। दिसंबर 2015 में तमिलनाडू की राजधानी चेन्नई को भी प्रकृति के रौद्र रूप का सामना करना पड़ा था, जब भारी बारिश के चलते पूरा शहर एक टापू में बदल गया और देश के दूसरे हिस्सों से उसका संपर्क टूट गया।
  • वहीं इससे पहले कश्मीर दो भयावह बाढ़ का सामना कर चुका है, जबकि जंगल में आग की हालिया त्रासदी झेल चुके उत्तराखंड में पिछले कई सालों से बरसात के दौरान आपदा की स्थिति आ खड़ी होती है।
  • वहीं मौसम विभाग के मुताबिक भारत में इस वर्ष अच्छे मानसून की उम्मीद है। यह उस संकेत के बाद कहा जा रहा है जबकि भारत में अल निनो के अस्पष्ट प्रभाव के चलते मौसम, खासतौर से मानसून का अनुमान लगाना मुश्किल है। 


=>सिस्टम को बेहतर बनाना होगा 
- इन सारी संभावनाओं और हकीकत के बीच पिछले महीने उत्तराखंड में बादल फटने के कारण आई प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर देश के आपदा प्रबंधन को कटघरे में ला खड़ा किया है। आपदाएं सिर्फ हमारे यहां नहीं आतीं, दुनिया के अन्य देश भी इसका सामना करते हैं। लेकिन इससे बचने के लिए उन्होंने अपने सिस्टम को बेहतर बनाया है। 

=>तीन बड़ी वजह जिन्होंने व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया 
१. संचार (communication)
- कम्यूनिकेशन कमजोर होने से पूरा प्रबंधन फेल हो जाता है। जापान और चीन ने अपना कम्यूनिकेशन मजबूत कर लिया है। अब इसी दिशा में ऑस्ट्रेलिया ने भी कदम बढ़ाए हंै और वह दुनिया का पहला टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा है। मेलबर्न यूनिवर्सिटी, आईबीएम और ऑस्ट्रेलिया के नेशनल हाई-टेक रिसर्च इंस्टीट्यूट एनआईसीटीए के साथ मिलकर इसे तैयार कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया डिजास्टर मैनेजमेंट ह्रश्वलेटफॉर्म का मुख्य फोकस कम्यूनिकेशन पर है। यह सभी जगह से डाटा एकत्रित करके कम्यूनिकेट करेगी। 
२. योजना (planing) 
बारिश के मौसम में बादल फटना, बाढ़ आना जैसी आपदाएं आने की आशंका होने के बावजूद हमारे यहां इसके लिए तय प्लानिंग नहीं की जाती। इसकी तुलना में हम ओमान देश के इमरजेंसी मैनेजमेंट सिस्टम से सबक ले सकते हैं। यहां 1988 में इमरजेंसी मैनेजमेंट सिस्टम स्थापित किया गया। 2007 में गोनू साइक्लोन के बाद इसे रिवाइव करके नेशनल कमेटी फॉर सिविल डिफेंस (एनसीसीडी) बनाया गया। यह प्राकृतिक आपदा प्रबंधन का प्लान तैयार करना, उसे समय-समय पर अपडेट कर, उसके हिसाब से काम करती है। 
३. तालमेल (coordination) 
- भारत के आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी है सरकार व सरकारी एजेंसियों के साथ उनका कमजोर को-ऑर्डिनेशन। इसके कारण सही समय पर बचाव के उपाय नहीं हो पाते। चीन की नेशनल कमेटी फॉर डिजास्टर रिडक्शन (एनसीडीआर) सरकारी मंत्रालयों और विभागों के साथ चीनी रेडक्रॉस समेत कुल 34 इकाइयों के साथ को- ऑर्डिनेट करती है।

- इस सेंट्रलाइज्ड नेटवर्क को स्थानीय स्तर पर अपनाया गया है। यहां एनसीडीआर आपदाओं की सूचना से लेकर उसे कम करने और आपदा के बाद राहत कार्य की जिम्मेदारी संभालती है।