सतर्कता के संकेत:भूकंप

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नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी ने आगाह किया है कि देश के 29 शहर भूकंप की दृष्टि से खासे संवेदनशील हैं। इनमें नौ राज्यों की राजधानी हिमालयी क्षेत्र के राज्य हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर पूर्वोत्तर के राज्य शामिल हैं।

  • एनसीएस ने भारतीय मानक ब्यूरो के भूकंप के रिकॉर्ड, टेक्टॉनिक गतिविधियों तथा सघन जनसंख्या वाले इलाकों में भूकंप से संभव क्षति केआकलन की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों को दो और पांच के भूकंपीय क्षेत्र में बांटा है।
  •  एक तरह से यह शासन-प्रशासन को सचेत रहने की नसीहत है ताकि भूकंप आने की स्थिति में जन-धन की क्षति को टाला जा सके।
  •  रिपोर्ट में दिल्ली, पटना, श्रीनगर, कोहिमा, पुडुचेरी, गुवाहाटी, गंगटोक, शिमला, देहरादून, इंफाल और चंडीगढ़ को संवेदनशीलता के नजरिये से भूकंपीय क्षेत्र दो और पांच के बीच बांटा गया है।
  • ज्यादा संवेदनशीलता के चलते बिहार, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, रण का कच्छ इलाका, अंडमान निकोबार हिमाचल प्रदेश को जोन पांच में शामिल किया गया है।
  • इस सर्वेक्षण का मकसद शासन-प्रशासन को सजग-सतर्क बनाने के अलावा जनता को भूकंप की आपदा के प्रति जागरूक बनाना है।

Fault on seismic front

  • देश में भूकंप के प्रति वैज्ञानिक सोच का विकास हो ही नहीं पाया।
  • भवन निर्माण शैली में भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल के बराबर हुआ है।
  •  सरकार की ओर से कोई मानक भूकंपरोधी आवास को लेकर विधिवत जारी नहीं किये गये हैं।
  • स्थानीय स्तर पर भी निगरानी करने वाली संस्थाएं मकानों के नक्शे पास करते वक्त उपलब्ध
  • मानकों को लागू करने की दिशा में गंभीर नजर नहीं आती।
  • वास्तव में भूकंप नहीं, बल्कि अनियोजित निर्माण निर्माण सामग्री की गुणवत्ता में कमी नुकसान का कारण बनती है।
  • देश में गरीबी संसाधनों की कमी के चलते आम लोग आनन-फानन में किसी तरह घर बना लेते हैं।
  • उनकी प्राथमिकता छत होती है। जबकि थोड़ी अधिक लागत से भूकंपरोधी आवास बनाये जा सकते हैं। सरकार के स्तर पर कम लागत वाले सर्वमान्य मानक तैयार करने की गंभीर पहल नहीं हुई।
  • फिर जो जानकारी उपलब्ध है उसका क्रियान्वयन नहीं हो पाता।
  • अनियोजित विकास और आपदा की स्थिति में बचाव के लिये चौड़ी सड़कों का अभाव और राहत का ढांचा उपलब्ध होना भी चिंता की बात है।
  •  जरूरत इस बात की है कि देश में भूकंप से बचाव की तकनीक आम आदमी तक पहुंचाई जाये। लोगों को बताना चाहिए कि किन परिस्थितियों में जनधन की हानि को टाला जा सकता है

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