सहज नियामकीय संचालन

#Editorial of business standard

Recent context taking global issue

अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत के गवर्नर जेरी ब्राउन ने अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाली प्रस्तावित नीतियों का सख्त विरोध किया है। पृथ्वी की निगरानी करने वाले उपग्रहों के बजट में कमी संबंधी प्रस्तावों का जिक्र करते हुए ब्राउन ने कहा, 'अगर ट्रंप इन उपग्रहों को बंद करते हैं तो कैलिफोर्निया अपने उपग्रह छोड़ देगा। हमारे पास वैज्ञानिक हैं, हमारे पास अधिवक्ता हैं और हम लडऩे के लिए पूरी तरह तैयार हैं।' 

Now situation in India

केंद्र और राज्य के बीच गतिरोध भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। दूसरा, ऐसा गतिरोध बुरा भी नहीं। दो चुनी हुई सरकारों के बीच समुचित संवाद न होने से शुरुआती दिक्कतें हो सकती हैं लेकिन यह आपसी तनाव ऐसी चीज है जो शासन-प्रशासन में संतुलन कायम रखने का काम करता है। बिना वजह आज्ञापालन करना लोकतंत्र की सेहत के लिए कतई अच्छा नहीं होता।

Taking this issue to regulatory bodies and is government interference to their functioning is justified

देश में नियामकों पर लागू होने वाले कानूनों में एक प्रावधान ऐसा है जो हर जगह लागू होता है। इसके तहत सरकार नियामकों के लिए ऐसे निर्देश दे सकती है कि वे नीतिगत मुद्दों पर क्या करें। ऐसे प्रावधानों में नीतिगत मसला क्या होगा यह तय करना सरकार का विशेषाधिकार होता है। अकेले इस प्रावधान की बदौलत ही नियामक हमेशा सरकार के सोच के अनुरूप ही चलते हैं। ऐसे प्रावधान का एक फायदा यह होता है कि नियामक को कभी औपचारिक रूप से नहीं बताना पड़ता है कि उसे क्या करना है। केवल मौखिक संकेत ही पर्याप्त होता है। कुछ ही नियामक अध्यक्ष यह साहस दिखा पाते हैं कि वे सरकार से ऐसे निर्देश जारी करने के पहले औपचारिक निर्देश जारी करने की मांग करें। 

  • महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कुछ ही नियामकीय प्रशासनिक बोर्ड ही सरकार के निर्देश से असहमति जता पाते हैं।
  •  पूंजी बाजार नियामक द्वारा ऐसा कदम उठाए जाने का एक उदाहरण हमारे सामने मौजूद है। उस वक्त बाजार नियामक ने बीमा कंपनियों द्वारा बेची जा रही यूनिट लिंक्ड बीमा योजनाओं से निपटने के कदम उठाए थे। बाजार नियामक के मुताबिक ये योजनाएं केवल बीमा योजना नहीं बल्कि म्युचुअल फंड योजनाएं भी थीं इसलिए इनके दोहरे नियमन की आवश्यकता थी।
  •  सरकार का कदम उठाना उसकी मजबूरी थी। तत्कालीन वित्त मंत्री ने पहले दोनों नियामकों से कहा कि वे इस मामले से अदालत में निपटें लेकिन जब कोई हल नहीं निकला तो पूंजी बाजार नियामक की आपत्तियों को खारिज करने के लिए अध्यादेश की सहायता ली गई।