क्विटो सम्मलेन: शहरों को समावेशी और सतत बनायें; ताकि शहर जीने के लायक रहें

आज का संपादकीय #The_Hindu_Editorial

सन्दर्भ:- यह एक बड़ी चुनौती है कि भारत सहित दुनिया भर में शहरों की आबादी जिस तरह से बढ़ रही है उस हिसाब से वहां जीवन की गुणवत्ता नहीं बढ़ रही. (द हिंदू का संपादकीय)

★दुनिया तेजी से शहर में तब्दील हो रही है और इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन शहरों में रहने वाले लोगों के लिए बराबरी के मौके कैसे उपलब्ध कराए जाएं. 
★हाल ही में इक्वाडोर के क्विटो में आवास और टिकाऊ शहरी विकास पर हुए संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन का केंद्रीय विषय यही था. यह आयोजन 20 साल में एक बार होता है.
★ इस लिहाज से सदस्य देशों के लिए यह अगले दो दशक का दिशासूचक नक्शा होता है और इसीलिए सरकारों और नागरिक समाज की इसमें खासी भागीदारी भी होती है.

★हालांकि अभी मजबूती से यह आकलन करने की जरूरत है कि पिछले दो सम्मेलनों के बाद अलग-अलग देशों ने शहरी गैरबराबरी को घटाने, घर, स्वच्छता और परिवहन में सुधार और महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के अधिकार सुनिश्चित करने जैसे मोर्चों पर कैसा प्रदर्शन किया है.
★ इसके अलावा जैसे-जैसे शहरी अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का प्रभुत्व स्थापित हुआ है, ऊंची तनख्वाह पाने वाले प्रोफेशनलों और कामकाजी आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा कम आय वाले कामगारों की जिंदगी का फर्क और भी बड़ा हुआ है. ये सभी बातें भारत के लिए प्रासंगिक हैं जहां 2011 की जनगणना के मुताबिक 31 फीसदी आबादी शहरी है. 
★देश की कामकाजी आबादी में 26 फीसदी शहरी क्षेत्र की भागीदारी है और शहरों-कस्बों की तरफ रुख करने वाले लोगों की संख्या हर साल बढ़ रही है. 
★सतत विकास के लक्ष्य हासिल करने के लिए हमें शहरी प्रशासन से जुड़ी नीतियों का उन वादों से तालमेल करना होगा जो हमने पेरिस समझौते में कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को लेकर किए हैं.

★भारत ने स्मार्ट सिटीज और अटल पुनर्जीवन एवं शहरी रूपांतरण योजना जैसे कई नीतिगत फैसलों से यह संदेश दिया है कि वह विज्ञान और डेटा की मदद के जरिये व्यवस्थित तरीके से शहरी नियोजन की दिशा में बढ़ना चाहता है. 
★लेकिन 21वीं सदी के शहरों को 20वीं सदी की औद्योगिक जरूरतों के हिसाब से बनाने के अपने विरोधाभास हैं जिन्हें ध्यान में रखना होगा. आज ये विरोधाभास कई रूपों में दिखते हैं. उदाहरण के लिए हमारे शहरों में पार्क और सार्वजनिक जगहें पर्याप्त संख्या में नहीं हैं. अलग-अलग सेवाएं देने वाले असंगठित क्षेत्र के कामगारों के रहने के लिए ढंग की जगह नहीं है.
★ सबको बराबरी का आभास कराने वाले परिवहन के स्वच्छ विकल्प नहीं हैं और न ही कम लागते वाले आवासों को लेकर कोई नया नजरिया है.

★क्विटो सम्मेलन के लिए तैयार की गई राष्ट्रीय रिपोर्ट में शहरी आवास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय ने अपनी सबके लिए आवास नीति का जिक्र किया है. 2011 की जनगणना के मुताबिक शहरों में कुल आवास का 17 फीसदी हिस्सा झुग्गियों से बनता है. 
★रिपोर्ट में मंत्रालय ने कहा है कि निजी एजेंसियों और आपदा प्रतिरोधी ‘प्रीफैब्रिकेटेड’ निर्माण के जरिये इन झुग्गियों का पुनर्विकास किया जाएगा. इस काम में सरकार सब्सिडी देकर अपनी भूमिका निभाएगी. यह एक महत्वपूर्ण परियोजना है जिसकी सालाना आधार पर समीक्षा होनी चाहिए और राज्यों को उनके प्रदर्शन के हिसाब से इस संबंध में रैंक दिया जाना चाहिए. 
★केंद्र को अपनी राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति को भी गंभीरता से लेना चाहिए जिसके तहत परिहवहन नेटवर्क को आधार बनाकर शहरों का विकास किया जाना है. 
★नए शहरी एजेंडे पर 2018 में कुआलालंपुर में होने वाली संयुक्त राष्ट्र की बैठक में इसकी समीक्षा होनी है कि हर देश इस दिशा में कितना आगे बढ़ा. तब इस पर भी सबकी नजरें रहेंगी कि भारत ने अपने शहरों में जीवन की गुणवत्ता के स्तर में कितना सुधार किया. 

Reference :- http://m.thehindu.com/opinion/editorial/making-cities-inclusive/article9258735.ece