भारतीय नौसेना : Challenges and reforms needed

Neglacted Indian Navy:

  • भारतीय नौसेना का आकार तीनों सेनाओं में सबसे छोटा है लेकिन यह नीति निर्माण में निपुण है। परंतु रक्षा आवंटन में इसकी हिस्सेदारी चार साल पहले के 18 फीसदी से घटाकर 14.5 फीसदी कर दी गई है। 
  • नौसेना के कई युद्घपोत और खरीद फंड की कमी से जूझ रहे हैं। परमाणु हथियार क्षमता संपन्न विमानवाहक पोत जैसी परियोजना लंबे समय से रुकी पड़ी है

Why to pay attention towards Navy:

  • नीतिकारों को नौसेना की जरूरतों पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। क्योंकि युद्घपोत तैयार करने और उनको नौसैनिक व्यवस्था का अंग बनाने में वर्षों लगते हैं। ऐेसे में जुगाड़ के भरोसे नहीं रहा जा सकता है।
  • चीन की हिन्द महासागर में बढती उपस्थति भारत की महासागरीय समाओ के लिए खतरा है जिसे neglact नहीं किया जा सकता |
  • Rimland theory के अनुसार अगला युद्ध world islands के लिए लड़ा जएगा और उसमे नौसेना की भूमिका बहुत ही महत्वपुर्ण है क्योंकि पूरा यह area जमीन से नहीं अपितु सागर से ही जुदा हुआ है
  • इसके अलावा हिन्द महासागर OBOR के पूर्ण होने पर एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग बनके उभरेगा और इसके लिए अपने सामरिक और आर्थिक interest की सुरक्षा के लिए NAVY का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक हो जाता है
  • चीन की string of pearls का सामना करने के लिए भी strong NAVY आवश्यक है
  • नेवी को दो सागरों और एक महासागर की रक्षा करनी होती है, समुद्री डकैतों से निपटना होता है, मानवीय सहायता और आपदा राहत का काम करना पड़ता है।

किन बातो पर ध्यान देना होगा NAVY को equip करने के लिए :

  • नौसेना को युद्घपोतों की जरूरत है ताकि वह क्षेत्रीय सुरक्षा की अपनी विविध जिम्मेदारी निभा सके।  नौसेना के योजना संबंधी दस्तावेज बताते हैं कि सन 2027 तक 198 युद्घपोतों की जरूरत होगी। इनमें से 120 यानी 60 फीसदी बड़े, आक्रामक, विमानवाहक और विध्वंसक पोत होने चाहिए और पनडुब्बियां भी। शेष 40 प्रतिशत छोटे युद्घपोत हो सकते हैं मसलन मिसाइल वोट, तेज हमला करने में सक्षम पैट्रोल बोट, उभयचर बोट और लॉजिस्टिक्स में मददगार बोट। फिलहाल नौसेना के पास केवल 140 पोत हैं जिनमें से बमुश्किल आधे ही पहली श्रेणी के भारी भरकम पोत हैं।
  • Capacity building of existing ship building docks: देश में मझगांव डाक और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स ऐंड इंजीनियर्स (जीआरसीई) ही भारी भरकम पोत बनाती हैं। वे क्षमता से ऊपर काम कर रही हैं। एमडीएल में चार विध्वंसक और चार युद्घपोत बन रहे हैं जबकि जीआरसीई छोटे पोत, तीन युद्घपोत और दो लड़ाकू जलपोत बना रही है। देश सबसे बड़े शिपयार्ड हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड और छोटे गोवा शिपयार्ड लिमिटेड में कभी भारी पोत नहीं बने। INDIA को इस पर विचार करना चाहिए।
  • सेवारत युद्घपोतों की पूर्ण क्षमता भी सुनिश्चित करनी होगी। तमाम वजहों से इनकी क्षमता प्रभावित है। टॉरपीडो की खरीद स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के लिए नहीं की गई है, कई भारी युद्घपोत शत्रुओं की पनडुब्बियों के जोखिम के साये में हैं क्योंकि उनमें आधुनिक सोनार नहीं हैं। भारत-इजरायल लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल क्षमता की कमी ने कई युद्घपोतों को पोतभेदी मिसाइलों के समक्ष अक्षम बना रखा है। 
  •  नौसेना के लिए मल्टी रोल हेलीकॉप्टर की खरीद पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। इन्हें  बड़े पोतों पर तैनात किया जा सकता है। इनकी मदद से पोत की क्षमता बहुत बढ़ जाएगी। वे शत्रुओं के जहाजों का पता लगा सकेंगे। दशकों से भारतीय युद्घपोतों पर वेस्टलैंड सी किंग- 42बी हेलीकॉप्टर तैनात रहे हैं लेकिन भारत के परमाणु परीक्षण के बाद जब अमेरिकी मातृ कंपनी ने कलपुर्जों पर रोक लगाई तो ये बेकार हो गए।
  • बेड़ों की मदद करने वाले जहाज:  ये मुख्यभूमि से दूर तैनात युद्घपोतों के लिए जरूरी हैं। इनसें ईंधन पहुंचाने, विभिन्न चीजों का भंडारण और मरम्मत आदि करने काम लिया जाता है। फिलहाल ऐसे चार पोत हैं।
  • दो 27,500 टन के टैंकर हैं दीपक और शक्ति। 35,900 टन का आईएनएस ज्योति और 24,600 टन का आईएनएस आदित्य। इस क्षमता में इजाफे के लिए एचएसल को 40,000 टन क्षमता वाले ऐसे पोत बनाने हैं।
  • इनके लिए तकनीक हस्तांतरण हुंडई हेवी इलेक्ट्रिकल्स कर रही है। इस सिलसिले में दक्षिण कोरिया सरकार के साथ बहुत धीमी गति से चर्चा चल रही है जिसे तेज करना आवश्यक है।
  •  इसी प्रकार चार बहु उद्देश्य पोतों के निर्माण को गति देनी होगी। इसके निजी और सरकारी पोत कारखानों से गत वर्ष बोली आमंत्रित की गई थी।
  •  4000-5000 टन क्षमता वाले ये पोत हर हुनर में माहिर होंगे। इनको लॉजिस्टिक्स सहयोग, एचएडीआर मिशन आदि के लिए प्रयोग किया जा सकेगा। आखिर में, हमें छह पनडुब्बियों के निर्माण की दिशा में तेजी से काम करना होगा। यह परियोजना पहले ही काफी पिछड़ चुकी है। ऐसा करने से पनडुब्बी प्रभाग मजबूत होगा।
  • वर्ष 2013 में आईएनएस सिंधुरक्षक के डूबने के बाद यह 12 तक सिमट गया है। वर्ष 2021 तक छह स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के बेड़े में शामिल होने के बाद कुछ राहत मिलेगी। फिलहाल एमडीएल में पनडुब्बी निर्माण की महंगी तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है जबकि सरकार प्रोजेक्ट 75एल को मंजूरी देने में भी समय गंवा रही है।