कृषि उत्पादों की उचित मार्केटिंग के लिए सरकार के उपाय

अब यह जरूरी हो गया है कि बाजार, किसान की पहुच के अन्दर हो और उनके और उपभोक्ताओं के बीच कोई बिचौलिया नहीं हो, उपज का मूल्य पारदर्शी तरीके से तय हो और किसान को उनकी उपज का अविलंब भुगतान हो। केन्द्र सरकार इसके लिए देश भर में एक ऐसा ढांचा खड़ा कर रही है जिसमें बाजार सीधे खेत से जुड़ जाएंगे और उपभोक्ता सीधे किसान के खेत से उपज खरीद सकेंगे। 

  •  केन्द्र सरकार किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत दिलाने के लिए पहले ही राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नाम अप्रैल 2016 में लांच कर चुकी है।
  • ई-नाम पोर्टल से मार्च, 2018 तक कुल 585 मंडियों को जोड़े जाने की योजना हैI
  • सितम्बर-2016 तक 200 मंडियों के लक्ष्य के सापेक्ष 10 राज्‍यों की 250 मंडियों को ई-नाम से जोड़ दिया गया हैI
  •  ई-नाम की इस नयी व्यवस्था में अब किसान कहीं भी बैठकर ऑनलाइन ट्रेडिंग के जरिए अपनी फसल बेच सकता है तथा इसके जरिए वह उपज की गुणवत्ता के अनुसार उत्तम मूल्य प्राप्त कर सकता है I
  •  यदि उसे मूल्य पसंद ना हो तो वह ऑनलाइन की गयी सर्वोच्च बोली खारिज भी कर सकता है।
  • किसान को ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था भी है। 
  • उन प्रदेशों की मंडिया ई-नाम से जुड़ सकती हैं जिन्होंने अपने विपणन कानूनों में तीन सुधार कर लिये हैं - ई ट्रेडिंग की व्यवस्था, एकल बिंदु पर मंडी शुल्क की उगाही और सिंगल लाइसेंस से पूरे प्रदेश में व्यापार।
  • दो प्रमुख राज्‍य बिहार और केरल कोई मंडी कानून न होने से अभी ई-नाम परियोजना से नहीं जुड़ पा रहे हैं।
  • किसानों को उपभोक्‍ताओं से सीधे जोड़ने के लिए वर्तमान सरकार किसानों के खेत से उत्‍पाद की सीधा खरीद को प्रोत्‍साहित कर रही है। इसके लिए 22 राज्‍यों ने अपने विपणन कानूनों में बदलाव भी कर लिया है। 
  • देश में कृषि उपज का विपणन, राज्य सरकारों की विनियमित मंडियों के माध्‍यम से किया जाता है, जिनकी कुल संख्या 6746 हैI उन्होंने कहा कि वैसे तो किसानों पर गठित राष्ट्रीय आयोग की सिफारिश के अनुसार 80 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक मंडी होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान में लगभग 580 वर्ग किलोमीटर में एक मंडी हैI मंडियों की संख्‍या बढ़ाने के लिए सरकार मंडी कानून में सुधार करवाकर निजी क्षेत्र की मंडियां स्‍थापित करवाने का प्रयास कर रही है। अब तक 21 राज्‍यों ने इस संबंध में अपने विपणन कानूनों में सुधार कर लिया है। 
Tags