नुकसानदायक है सेहत के आंकड़े सुधारने की संकीर्ण सोच

#Editorial of Hindustan Times

NARROW VIEW of Health

किसी देश में लोगों की सेहत का क्या हाल है, इसे आंकने और मापने के हमने तीन-चार पैमाने बना लिए हैं। इन्हीं पैमानों को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। इनमें सबसे अधिक महवपूर्ण हैं-

  • शिशु दर,
  • बाल मृत्यु दर व
  • मातृ मृत्यु दर।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन्हें कम करना व न्यूनतम करना स्वास्थ्य क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है और इसे उच्च प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। लेकिन जब ज्यादातर ध्यान केवल कुछ संकेतकों पर ही केंद्रित होकर रह जाता है, तो इससे कई विसंगतियां भी पैदा होती हैं।

  • जैसे जब सबसे अधिक ध्यान पांच वर्ष तक की आयु के स्वास्थ्य पर केंद्रित हो जाता है, तो उससे अधिक उम्र के बच्चों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इस वर्ग के बच्चों की सेहत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।
  • यहां तक कि प्रमाणिक आंकड़े भी पांच वर्ष की आयु तक के बच्चों के ही मिलते हैं। उससे अधिक उम्र के बच्चों के बारे में व उनकी मृत्यु दर के बारे में प्रमाणिक आंकड़े तक प्राप्त करना बहुत कठिन हो गया है। इस बारे में बहुत चर्चा होती है कि 0-5 वर्ष के आयु-वर्ग में मृत्यु दर क्या है? पर पांच से 10 वर्ष के आयु-वर्ग या 10 से 15 वर्ष के आयु-वर्ग के बारे में चर्चा बहुत कम होती है।
  • इस स्थिति में बच्चों के समग्र विकास के बारे में या इस विषय पर समग्र सोच विकसित करने में कठिनाई होती है। किशोर आयु-वर्ग पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
  •  5 से 10 वर्ष के आयु-वर्ग पर तो और भी बहुत कम ध्यान दिया जाता है, क्योंकि मुख्य संकेतकों की प्राथमिकता में यह आयु-वर्ग नहीं आ पाता है।

पर बच्चों के विकास की अपनी स्वाभाविक निरंतरता होती है, जिसे सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड की दृष्टि से रखे जाने वाले विभाजन में बांटा नहीं जा सकता है। मान लीजिए कि आपने पांच वर्ष तक के बच्चों की मृत्यु दर को किसी तरह इस आयु-वर्ग पर ध्यान केंद्रित करके कम कर भी लिया, पर इसके बाद के आयु-वर्ग में बच्चों के स्वास्थ्य को उचित महत्व नहीं मिला, तो इससे कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त नहीं होगी।

Need a holistic view of Health

स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई असरदार दवाएं, वैक्सीन व तकनीक उपलब्ध हैं। इनके उपयोग से मृत्यु दर कम किया जा सकता है, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मगर मृत्यु दर को टिकाऊ तौर पर कम करने का जो व्यापक उद्देश्य है, वह गरीबी, अभाव, भूख, कुपोषण, और विषमता दूर करने से प्राप्त हो सकता है। इस व्यापक आर्थिक-सामाजिक सोच को दूर रखकर केवल तकनीकी क्षमताओं के आधार पर मृत्यु दर कम किया जाता है, तो यह उपलब्धि बहुत टिकाऊ नहीं होती। ऐसी उपलब्धि का दायरा बहुत संकीर्ण रहता है। दूसरी ओर गरीबी, भूख, कुपोषण व विषमता दूर करके जो उपलब्धि प्राप्त की जाती है, वह अधिक टिकाऊ व व्यापक होती है।

Benefit of Holistic view:

यदि स्वास्थ्य संबंधी समग्र व व्यापक सोच को अपनाया जाए, तो बहुत-सी बीमारियों को एक साथ कम किया जा सकता है। इस स्थिति में अलग-अलग बीमारियों व स्वास्थ्य समस्याओं के लिए अलग-अलग अभियान चलाने व अलग से कार्यक्रम बनाने की जरूरत नहीं पड़ती है, और इस तरह बहुत या फालतू का खर्च बच सकता है। हाल के समय में अनेक बड़े अभियान अलग से चले। जैसे पोलियो अभियान, एड्स अभियान, जिनमें कुछ सफलता भी मिली, पर उस समय यह ध्यान में नहीं रखा गया कि एक ही अभियान पर बजट व मानव संसाधन अधिक केंद्रित होने से स्वास्थ्य के अन्य क्षेत्रों पर कितना प्रतिकूल असर पड़ता है।

कुछ संकेतकों पर ध्यान केंद्रित होने से कई बार ऊपर से आदेश आते हैं कि और चाहे कुछ भी हो, इनके आंकड़े सफलता दर्शाने वाले होने चाहिए। यदि ये आंकड़े सफलता न दर्शाएं, तो संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है। इससे एक दबाव का सिलसिला बन जाता है। इन सब विसंगतियों से बचाने के लिए स्वास्थ्य के प्रति अधिक व्यापक व समग्र सोच अपनाना जरूरी है। इस व्यापक सोच के तहत विभिन्न बीमारियों व स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज व रोकथाम को विभिन्न स्तरों पर सार्थक सामाजिक बदलाव से जोड़ने के प्रयास भी होने चाहिए तथा समता आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को एक अति महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए।