वित्तीय पारदर्शिता में राज्यों को भी बनाना होगा भागीदार

financial transparency and states cooperation
#Business_Standard
पिछले वर्षों में भारत में सार्वजनिक वित्त पर विमर्श काफी हद तक केंद्र सरकार के खर्चों के प्रबंधन और उसके राजस्व संग्रह पर ही केंद्रित रहा है। लोक नीति के टिप्पणीकारों ने इस पर काफी कुछ लिखा है कि केंद्र को आर्थिक संसाधनों का आवंटन करते समय क्यों राजकोषीय विवेक के रास्ते पर चलना चाहिए? Fiscal deficit and states
    हालांकि इस दौरान देश के 29 राज्यों के राजकोषीय विवेक के बारे में बहुत कम चर्चा हुई है। यह सच है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसे संस्थानों या रेटिंग एजेंसियों की चिंता देश के समग्र राजकोषीय घाटे पर अधिक रहती है जिसमें केंद्र के साथ राज्यों का भी राजकोषीय घाटा शामिल होता है। अधिकांश मीडिया विश्लेषणों में केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे पर ही जोर रहने से राज्यों पर अपने राजकोषीय प्रबंधन के तरीके अपनाने का दबाव कम रहा है। जरूरत इस बात की है कि इस स्थिति को बदला जाए। 
    पांच साल पहले तक सभी राज्यों का कुल बजट आकार में केंद्र के बजट से कम ही होता था। वर्ष 2011-12 में केंद्रीय बजट 13.04 लाख करोड़ रुपये का था जो सभी राज्यों के 12.85 लाख करोड़ रुपये के कुल बजट से अधिक था। लेकिन उसके अगले ही साल राज्यों का समेकित बजट पहली बार केंद्रीय बजट को पार कर गया था। वर्ष 2012-13 में केंद्रीय बजट 14.1 लाख करोड़ रुपये था जबकि राज्यों का कुल बजट 14.55 लाख करोड़ रुपये हो चुका था। उसके बाद से केंद्र एवं राज्यों के बजट आकार में अंतर लगातार बढ़ा है। वर्ष 2016-17 में राज्यों का कुल बजट 27.24 लाख करोड़ रुपये हो गया जो 20.14 लाख करोड़ रुपये के केंद्रीय बजट से करीब एक तिहाई अधिक है।
जहां तक राजकोषीय विवेक का सवाल है तो राज्यों में इसे लेकर नकारात्मक रुख रहा है। वर्ष 2011-12 में राज्यों का समेकित राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 1.9 फीसदी था जबकि केंद्र का राजकोषीय घाटा 5.8 फीसदी था। लेकिन वर्ष 2016-17 में राज्यों का राजकोषीय घाटा 3.66 फीसदी के स्तर पर पहुंच गया जो केंद्र के राजकोषीय घाटे 3.5 फीसदी से अधिक है। लिहाजा न केवल राज्यों का बजटीय आकार केंद्र से बड़ा हो चुका है बल्कि उनका राजकोषीय घाटा भी केंद्र को पीछे छोडऩे लगा है। इसके बावजूद छिटपुट टिप्पणियों को छोड़कर राजकोषीय सशक्तीकरण पर होने वाला विमर्श काफी हद तक इसी पर केंद्रित रहता है कि केंद्रीय राजकोषीय घाटे पर काबू पाने के लिए वित्त मंत्री क्या कदम उठाने जा रहे हैं? इससे साफ है कि राजकोषीय घाटे पर हमारा नजरिया असंतुलित है और उसमें बदलाव की जरूरत है।


What reforms initiated


    राज्यों और केंद्र के स्तर पर लागू सुधारों पर एक नजर डालते हैं। भारत में कारोबारी सुगमता पर आई नवीनतम विश्व बैंक रिपोर्ट से कुछ नीतिगत पहलू सामने आते हैं। भारत की समग्र रैंकिंग 130 से सुधरकर 100वें स्थान पर आ चुकी है। 
    भारत को कर भुगतान, दिवालिया समाधान, कर्ज लेने और अल्पांश शेयरधारकों के हितों को संरक्षित करने जैसे कदमों का फायदा हुआ वहीं यह भी सच है कि ये सारे कदम केंद्र सरकार ने उठाए हैं।
India and Financial reform in state
     इसके उलट राज्यों ने नीतियों और प्रक्रियाओं में सुधार को तवज्जो नहीं दी। राज्यों में प्रक्रियागत सुधार की रफ्तार या तो कम हो रही है या बहुत धीमी गति से काम हो रहा है। कारोबार शुरू करने, बिजली कनेक्शन लेने और प्रॉपर्टी पंजीयन के मामले में तो भारत की रैंकिंग गिर गई। यहां हमें यह ध्यान रखना होगा कि ये सारी गतिविधियां राज्यों के स्तर पर ही क्रियान्वित की जाती है।
विदेशी निवेशक भी भारत में कारोबार के इस विरोधाभास को लेकर सतर्क हो गए हैं। आम तौर पर वे केंद्र सरकार द्वारा जारी बॉन्ड खरीदने में काफी रुचि दिखाते हैं लेकिन राज्य सरकारों द्वारा दिए जाने वाले कर्जों के प्रति उनका रवैया ठंडा है। 
    विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने केंद्र सरकार के बॉन्ड में निवेश की अधिकतम सीमा 1.9 लाख करोड़ रुपये का करीब 99 फीसदी हिस्सा खरीद लिया है। लेकिन राज्य सरकारों के बॉन्ड एसडीएल में भी 30,000 करोड़ रुपये के निवेश की मंजूरी का केवल 17 फीसदी हिस्सा ही विदेशी निवेशकों ने खरीदा है। इसका राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर असर पड़ेगा। राज्यों को बढ़ते राजकोषीय घाटे के चलते चालू वित्त वर्ष में 4.5 लाख करोड़ रुपये का ऋण लेना पड़ सकता है। एसडीएल में विदेशी निवेशकों का घटता रुझान राज्यों की आर्थिक स्थिति में आ रही कमजोरी को बयां करता है। चिंता की बड़ी बात यह है कि इससे इन बॉन्ड की कीमतों पर उल्टा असर पड़ता है। विदेशी निवेशकों ने राज्यों के बॉन्ड में कम रुचि दिखाने के लिए वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की कमी को जिम्मेदार बताया है। राज्य सरकारें जिस तरह से वित्तीय मामले संभालती हैं उससे विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन कर पाना मुश्किल होता है। केंद्रीय बैंक ये आंकड़े जारी करता है लेकिन उसमें दो साल का वक्त लगता है। ऐसे में अधिकतर टिप्पणीकारों और विश्लेषकों को इस बाधा से जूझना होता है।
ऐसे में एक मानकीकृत ढांचे की तत्काल जरूरत है ताकि सभी राज्य बिना देरी के बजट आंकड़े पेश कर सकें। यह सच है कि सभी राज्यों का समेकित बजट और उनका राजकोषीय घाटा केंद्र से आगे निकल चुका है। ऐसे में राज्यों को अपने बजट आंकड़े अलग रूप में पेश करने की छूट नहीं दी जा सकती है। रेटिंग एजेंसियां इस पर एतराज जता सकती हैं जिससे भारत की समग्र रैंकिंग भी प्रभावित हो सकती है। राज्यों में प्रक्रियागत सुधार लागू करने और उद्योग एवं वाणिज्य मंजूरी देने में सुधार नहीं होने तक कारोबारी सुगमता रैंकिंग में सुधार नहीं आ सकता है। पारदर्शिता और राजकोषीय नीति मानकों में सुधार लाना कई तरह से संघ की जिम्मेदारी है क्योंकि इन्हें नजरअंदाज करने का असर सारे देश पर पड़ेगा। मोदी सरकार अक्सर सहकारी संघवाद की बात करती है लिहाजा इस सोच को अंजाम देने का वक्त आ चुका है। राज्यों को भी अपने वित्तीय मामलों में अधिक पारदर्शिता लाने के साथ सुधारों की पहल करनी होगी। क्या नीति आयोग इसे अपनी बड़ी जिम्मेदारी के तौर पर स्वीकार करेगा?
 

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