हिरासत में मौत

custodial death is not new for the Indian society. Since the British rule, people have been dying in the police custody during investigation. this article discuss need for a comprehensive law to check this tendancy.

#Jansatta
हालांकि भारत ने मानवाधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र के अन्य संकल्प-पत्रों की तरह कैदियों के भी अधिकारों का खयाल रखने और उन्हें यातना न देने के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किया हुआ है। पर सारी दुनिया को जो भरोसा दिलाया गया, हकीकत उससे अलग है। 
What is reality
यहां कैदियों के साथ मानवीय सलूक होना तो दूर, उलटे उन्हें बुरी तरह मारा-पीटा जाता है। पुलिस मानो यह मान कर चलती है कि हिरासत में लिये गए व्यक्ति के साथ कुछ भी किया जा सकता है और इस बारे में किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं होगी। सिर्फ शक की बिना पर पकड़े व्यक्ति को हिरासत में बर्बरता झेलनी पड़ती है, जिसमें उसे थप्पड़ मारे जाने से लेकर बुरी तरह मारे-पीटे जाने और यातना दिए जाने के तमामतरीके शामिल हैं। इसलिए हैरत की बात नहीं कि विचाराधीन कैद के दौरान कइयों की मौत हो जाती है। यह राहत की बात है कि हिरासत के दौरान कैदियों की मौत के मामलों को न्यायपालिका ने गंभीरता से लिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर में सभी उच्च न्यायालयों से कहा था कि 2012 के बाद जेलों में हिरासत के दौरान अस्वाभाविक मौत के मामलों में कैदियों के परिजनों की पहचान के लिए स्वत: याचिका दर्ज करें और यदि पहले पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया गया है तो उचित मुआवजा देने का आदेश दें।
गौरतलब है कि इस निर्देश के अनुरूप सोलह उच्च न्यायालयों में कार्यवाही शुरू की गई है। आठ उच्च न्यायालयों ने कार्यवाही की बाबत फिलहाल जानकारी नहीं दी है। सर्वोच्च अदालत ने देश की 1382 जेलों में कैदियों की अमानवीय स्थिति को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान बाकी यानी आठ उच्च न्यायालयों को भी हिरासत में मौत से संबंधित मामलों पर यथाशीघ्र करने का निर्देश भेजा है। इस अदालती पहल का औचित्य जाहिर है। हमारे देश में अधिकतर मामलों में हिरासत संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं होता। जो होता है वह बहुतों के लिए दु:स्वप्न ही साबित होता है। एक विचाराधीन कैदी पर लगा अभियोग सिद्ध न हो, तो अदालत उसे बाइज्जत बरी करने का हुक्म देती है। लेकिन पुलिस थाने और जेल में उसने जो भोगा होता है उसे वह जिंदगी में शायद ही कभी भुला पाता है।
    मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से 2015 के दरम्यान यानी छह साल में करीब छह सौ लोग पुलिस हिरासत में जिंदगी से हाथ धो बैठे। 
    पुलिस अमूमन ऐसे वाकये को खुदकुशी या बीमारी से हुई मौत बता कर पल्ला झाड़ लेती है। जबकि असल वजह होती है हिरासत के दौरान दी गई यातना, जिसके लिए ‘थर्ड डिग्री’ नाम प्रचलित है। यों तो कानूनन इस तरह के व्यवहार की मनाही है, और गिरफ्तारी व हिरासत संबंधी दिशा-निर्देश भी बने हुए हैं। पर बहुत सारे मामलों में हिरासत में लिये गए व्यक्ति को चौबीस घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के नियम का भी पालन नहीं होता।
सर्वोच्च अदालत और उच्च न्यायालयों ने हिरासत में हुई मौतों पर स्वत: संज्ञान लेकर, नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए उन्हें संविधान की तरफ से सौंपी गई जिम्मेदारी के प्रति गंभीरता का ही परिचय दिया है। इसी के साथ, उन्हें इस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या किया जाए कि किसी को विचाराधीन कैदी के रूप में, यानी अभियोग सिद्ध हुए बगैर, जेल में न सड़ना पड़े।

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