मीडिया जनतंत्र की रक्षा करने का एक आधारभूत तत्व है “ टिपण्णी कीजिए

औपनिवेशिक काल में जनता के बीच जागरूकता फैलाने से लेकर वर्तमान  में लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत आधार प्रदान करने में मीडिया की सशक्त भूमिका को समझा जा सकता है। इस माध्यम ने जनतंत्र के बीच जो खाई है उसको कम किया है और जनतंत्र को सुदृढ़ आधार प्रदान किया है |जिस कारण इसको जनतंत्र का चौथा स्तम्भ कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी

भारत जैसे देश में जहाँ अधिकतर जनता जागरूक एवम् असंगठित है ऐसे में सरकार की नीतियों का विश्लेषण एवम् खामियों को उजागर करने में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। कनून व्यवस्था एवम् प्रशासनिक दक्षता के लिए सरकार द्वारा भी सामाजिक मीडिया का प्रयोग किया जा रहा है। लोक महत्व के विषय पर इसने कई बार जनता को लामबंद कर सरकार पर दबाव बनाया चाहे वह अन्ना आंदोलन हो या निर्भया कांड हो। संविधान के अनुच्छेद 19 में मिले अभिव्यक्ति की आजादी के सैद्धान्तिक रूप को मीडिया ने सामाजिक मीडिया के रूप मे मूर्त रूप प्रदान किया है।

इस माध्यम ने लोगों को नई आवाज प्रदान की है जिस माध्यम से यह सरकार की जवाबदेहिता सुनिश्चित करता है| इसने कई भ्रष्टाचार के मामले चाहे वो cash for vote scam हो या 2 G स्पेक्ट्रम घोटाला यह सब मीडिया की वजह से ही उजागर हो पाए थे | इसने investigative journalism के जरिए इसको नया आयाम दिया है| न केवल इसमें इसने रचनात्मक कार्यों जैसे नीति निर्माण में भी जनता की भागीदारिता निश्चित की है जहाँ  वो जनता की समस्या को सरकार के सामने पेश करती  है और उस और ध्यान देते हुए सरकार नीतियाँ बनाती है जो लोकतंत्र का मूल आधार है |

इस माध्यम ने कई मामलों में जहां सरकारी तंत्र बाह्य ताकतों के सामने झुक गया उन मामलों में आम जन को न्याय दिलाने में मदद की है | उपहार या विनीत कटारा murder case हो या भोपाल गैस काण्ड या जसिका लाल case सब यही दर्शाते है |

लेकिन हाल के वर्षों में मीडिया विपथगमन का शिकार हो गई है। पूंजीपतियों के प्रभाव, सरकार की तरफदारी,सनसनी  खबरे,  पीत पत्रकारिता का बढ़ता प्रचलन,मीडिया ट्रायल, फर्जी खबरों की बढ़ती प्रवृति जो कई बार सामाजिक सौहार्द्र के लिए चुनौती  बन जाता है। ये  मुद्दे मीडिया के विपथगमन को रेखांकित करता है। हाल ही में TRP बढाने के चक्कर में जो कुछ पठानकोट  में हुआ और किस तरह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा  को ताक  में रखा गया को भी इसी  सन्दर्भ में समझा जा सकता है।

इसमें कोई शक नहीं है कि भारत जैसे देश में अभी भी मीडिया लोकतन्त्रिक मूल्यों एवम् जनता की आकांक्षाओं की प्रहरी की भूमिका  है और इसका सवतन्त्र और निष्पक्ष रहना लोकतंत्र के कार्यान्वयन के लिए जरूरी है ।पर उपरोक्त घटनाएं इसके दुष्परिणाम को भी दर्शाती है | समय की यह मांग है की मीडिया पर नियमन किया जाए पर वो नियमन बाह्य न होकर स्वैच्छिक होना चाहिए | मीडिया को चाहिए की वो कोर्ट trial ना करें , ना ही देश की आंतरिक सुरक्षा और उसके हितो से खिलवाड़ | उसको  अपनी सीमाए खुद तय करनी चाहिए  ताकि मीडिया पर जनता की विश्वसनीयता बनीं रहे।

 

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