वरदा से मिले सबक ऐसी आपदाओं से निपटने की हमारी तैयारी को और सुधार सकते हैं

(द एशियन एज की संपादकीय टिप्पणी)

सन्दर्भ :- जिस तरह से हमने खुद जलवायु परिवर्तन को न्योता दिया है उसे देखते हुए आज कुदरत ही हमारे लिए सबसे बड़ा संकट साबित हो सकती है.

 

एक भयानक त्रासदी चेन्नई से होकर गुजरे वरदा तूफान ने भयानक तबाही मचाई है. राहत की बात यह रही कि इससे होने वाली मौतें कम से कम (तमिलनाडु में करीब 18 लोगों की मौत हुई) रहीं. यह बताता है कि ऐसी भीषण मौसमी हलचलों से निपटने की हमारी तैयारी में कितना सुधार आया है.

  • हमने सीख लिया है कि जीवन का क्या मोल है और गरीबों और वंचितों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली प्राकृतिक आपदाओं के दौरान नुकसान को कम से कम रखने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए. यह देखना सुखद है. आपदा राहत बल की टीमों ने तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में समुद्र के पास निचले इलाकों में रह रहे लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया था. बनिस्बत कम नुकसान झेलने वाले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जिस तरह सभी से तमिलनाडु की मदद करने की अपील की, उसकी सराहना की जानी चाहिए.
  • भारत की तैयारी :वरदा से निपटने की भारत की तैयारी असरदार थी, यह इससे भी समझा जा सकता है कि इसी तूफान से थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया में 100 से ज्यादा मौतें हुईं जबकि भारत में यह आंकड़ा कहीं कम रहा. ग्लोबल वार्मिंग से मौसम में होने वाला बदलाव जारी है और इसलिए आगे भी हमें अक्सर तूफान और अतिवृष्टि जैसी चुनौतियों को पहले से ज्यादा संख्या में झेलना पड़ सकता है.
  •  कम से कम हम इनसे निपटने की तैयारी तो कर ही सकते हैं. कोई तूफान कहां-कहां से होकर गुजरेगा, अब इसकी सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है और इससे तैयारी में मदद मिलती है. इस तरह की विशेषज्ञता अभी तक हमें बाढ़ और भूकंप के मामले में हासिल नहीं है. बाढ़ की विभीषिका को पानी के इलाके में इंसानी अतिक्रमण ने बढ़ाया है जैसा कि बीते साल चेन्नई में बीते साल देखा गया. इस बाढ़ ने 500 से ज्यादा जानें लील ली थीं. इसे देखते हुए निर्माण से जुड़े नियम तोड़ने वालों के खिलाफ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी.
  • वरदा से निपटने के दौरान एक अच्छी बात यह भी देखने को मिली कि दक्षिण के इन दोनों राज्यों की सरकारों ने समय पर केंद्रीय आपदा बलों की मदद मांग ली. साथ ही उन्होंने राज्य और केंद्रीय बलों के बीच सोशल मीडिया और संचार के दूसरे माध्यमों के जरिये बढ़िया समन्वय भी स्थापित किया.
  •  स्कूल-कॉलेजों और दफ्तरों की छुट्टी जैसी सावधानियां थोड़ा अतिरेकी लग सकती हैं क्योंकि सारे तूफान वरदा की तरह नहीं होते. लेकिन ये जरूरी हैं क्योंकि इस तरह की आपदाओं में ज्यादातर मौतें उन्हीं लोगों की होती हैं जो घर की चाहरदीवारी की सुरक्षा के बाहर होते हैं.
  • जिस तरह से हमने धरती के संसाधनों का दुरुपयोग किया है और जलवायु परिवर्तन को न्योता दिया है उसे देखते हुए आज कई मौकों पर कुदरत ही हमारे लिए सबसे बड़ा संकट साबित हो सकती है. इस लिहाज से वरदा ने हमें जो सिखाया है उससे ऐसी आपदाओं से निपटने की हमारी प्रक्रिया में और सुधार आना चाहिए.