क्यों जरुरी है BRICS के लिए common agendas

ब्रिक्स का संघर्ष :

कागज पर पांच देशों का समूह ब्रिक्स एक मजबूत संगठन नजर आता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ब्रिक्स अपने सदस्य देशों के बीच एक साझा पहचान और संस्थागत सहयोग कायम करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

Historical background :

ब्रिक्स 2001 में गोल्डमैन सैक्स के एक अर्थशास्त्री की ब्रिक अवधारणा का ही विस्तार है| शीतयुद्ध के बाद पहले महत्वपूर्ण गैरपश्चिमी ग्लोबल पहल के रूप में ब्रिक्स का उदय हुआ है।

Brics and global power

 यह न सिर्फ अटलांटिक प्रभुत्व को धीरे-धीरे कम कर रहा है, बल्कि यह भी दर्शा रहा है कि विश्व स्तर पर शक्ति संतुलन में किस तरह बदलाव आ रहा है। यदि ब्रिक्स देश सामूहिक रूप से मिलकर काम करने लगें तो यह ग्लोबल वित्तीय और गवर्नेस प्रणाली में मौलिक बदलावों का वाहक बन सकता है।

Internal Contradiction in Brics:

आज ब्रिक्स जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है वे मौलिक हैं। दुनिया के विभिन्न देशों में परस्पर विरोधी राजनीतिक प्रणाली, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय लक्ष्य हैं और ये देश विश्व के अलग-अलग हिस्सों में स्थित हैं। ब्रिक्स देशों में भी यह अंतर बहुत साफ है।

  • उदाहरण के लिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत और दुनिया के सबसे बड़े एकतंत्र चीन में क्या समानता है? चीन द्वारा भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश पर दावा किया जाता है। वह अपने इस दावे को लेकर इस हद तक जाने के लिए तैयार है कि जब भारत में अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा ने इस राज्य का दौरा किया तो उसने सख्त ऐतराज जताया और अब जब दलाई लामा के वहां जाने की बात आ रही है तो फिर उसने आक्रामक तरीके से इसका विरोध किया। चीन के इस तरह के रुख के चलते दोनों देशों के बीच कैसे निकटता कायम हो सकती है?
  • चीन दक्षिण चीन सागर पर मनमाने आचरण का परिचय दे रहा रहा है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित हर जगह वह पाकिस्तानी आतंक का बचाव कर रहा है?
  • हाल के वर्षो में ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाएं जिस तरह से धराशायी हुई हैं उससे ब्रिक्स की चुनौतियां और बढ़ गई हैं। यहां तक कि चीन की अर्थव्यवस्था भी उथलपुथल का सामना कर रही है और उसका प्रतिकूल प्रभाव विश्व बाजार पर भी पड़ा है।
  •  ब्रिक्स की मंदी का सिर्फ भारत ने ही सामना किया है। भारत को आज दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का गौरव मिला है।करीब छह साल बाद भी ब्रिक्स अभी भी एक सुसंगत समूह के रूप में काम नहीं कर पा रहा है ताकियह अपने साझा उद्देश्यों को हासिल कर सके और एक संस्थागत ढांचा का रूप ले सके। 
  • ब्रिक्स में शामिल किन्हीं दो देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध उतने प्रगाढ़ नहीं हैं जितने कि उनके मजबूत संबंध अमेरिका के साथ हैं।
  • जहां तक अंतरराष्ट्रीय संस्थागत सुधार की बात है तो यहां भी चीन की सोच दूसरे सदस्य देशों से अलग है। चीन ग्लोबल वित्तीय ढांचे के संबंध में एक अलग तरह की शक्ति है। वह विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष को प्रतीकात्मक रूप से ब्रिक्स न्यू डेवलपमेंट बैंक और चीन निर्मित एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक द्वारा चुनौती देकर उन पर हावी होना चाहता है। इसी के साथ वह संयुक्त राष्ट्र में कोई सुधार नहीं चाहता है। अर्थात वह संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में एशिया का एकमात्र देश बना रहना चाहता है। इसका अर्थ हुआ कि वह भारत को इससे बाहर रखना चाहता है।
  • हाल के गोवा सम्मेलन में यह चेतावनी थी कि ब्रिक्स को आगे बढ़ने के लिए एक साझा कार्ययोजना की अभी भी दरकार है। 
  • Double standard on terrorism: चीन की जिद के कारण गोवा घोषणापत्र में सीमापार आतंकवाद या राज्य प्रायोजित आतंकवाद का जिक्र नहीं हो पाया। आइएसआइएस और अल नुसरा के उल्लेख के बावजूद पाकिस्तान स्थित किसी भी आतंकवादी संगठन का नाम इसमें नहीं शामिल किया गया। 

Need for Common goals in front of BRICS:

ब्रिक्स के सामने आज यह सवाल है कि क्या इसके सदस्य देश अपने विभिन्न उद्देश्यों और हितों के साथ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर एक हो सकते हैं? 

यदि ब्रिक्स अपना सामूहिक रसूख बनाना चाहता है तो इसके सदस्यों को अंतरराष्ट्रीय मुद्दों का सामना करने के लिए साझा उद्देश्य और तौर तरीके विकसित करने चाहिए।

Lesson to be learnt from G7: जी-7 समूह भी ब्रिक्स की तरह ही चर्चा के मंच के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन कुछ ही सालों में यह साझा हितों को परिभाषित कर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर संयुक्त आवाज के रूप में उभरा। ब्रिक्स में जी-7 की तरह साझा राजनीतिक और आर्थिक मूल्यों का अभाव है। यह स्वयं को प्रासंगिक नहीं रख सकता है यदि यह अपने नेताओं और हितधारकों को बहस करने से आगे कुछ सोचने पर विवश नहीं करता।