शिक्षा की मुहिम में नजरंदाज दिव्यांग बच्चे

#  सम्पादकीय Hindustan times

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संसद द्वारा दिव्यांगों (विकलांगों) के अधिकारों से जुडे़ जिस विधेयक को पारित किया गया है, उसमें दिव्यांग बच्चों के लिए कुछ खास प्रावधान हैं।

  • अब दिव्यांग बच्चों को छह से 18 साल तक नि:शुल्क शिक्षा मुहैया कराई जाएगी, जबकि मौजूदा प्रावधान में यह आयु सीमा छह से 14 वर्ष है, जो शिक्षा के अधिकार कानून के तहत सभी वर्ग के बच्चों पर लागू होती है।

इसके पीछे तर्क : दिव्यांग बच्चों की उम्र सीमा बढ़ाने के पीछे नजरिया यह है कि सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े समुदायों के और गांवों में रहने वाले लोग कई कारणों से अपने दिव्यांग बच्चों को कानून के तहत निर्धारित आयु के अनुसार स्कूल में नामांकन नहीं करा पाते। उनके बच्चे शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित न रह जाएं, इसी मंशा से यह सुविधा दी गई है। ऐसे बच्चों के लिए स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण भी बढ़ाकर पांच प्रतिशत तक कर दिया गया है।

एक नजर जमीनी आंकड़ो पर

  • मुल्क में करीब 30 प्रतिशत दिव्यांग बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। यह संख्या सरकारी प्रयासों के बारे में बहुत कुछ बताती है।
  • भारत ने ‘यूएन कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ पर्सन्स विद डिसैबिलिटीज (2007)’ पर हस्ताक्षर किए हैं और दिव्यांग बच्चों को समावेशी व गुणात्मक शिक्षा मुहैया कराने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता भी जाहिर की थी, मगर जमीनी हकीकत यह है कि ऐसे बच्चों को विकलांगता का प्रमाणपत्र तक संबंधित विभागों से समय पर नहीं मिलता।
  • साल 2011 की जनसंख्या के अनुसार, देश में 2.68 करोड़ दिव्यांग हैं।
  • डिपार्टमेंट ऑफ एम्पॉवरमेंट ऑफ पर्सन्स विद डिसैबिलिटीज की 2015-16 की वार्षिक रिपोर्ट खुलासा करती है कि 31 अगस्त 2015 तक 49.5 प्रतिशत लोगों को ही विकलांगता प्रमाणपत्र जारी हो पाए। विकलांग के लिए विकलांगता प्रमाणपत्र उसकी हकदारी को साबित करने वाला एक आधारभूत दस्तावेज है।

Challenges to provide quality education to differently abled person:

दिव्यांग बच्चों को समावेशी, गुणात्मक शिक्षा देने के रास्ते में कई चुनौतियां हैं।

  • ऐसे बच्चों को स्कूल भेजने के लिए जागरूकता अभियान
  • उनकी जरूरतों के मुताबिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था
  • विशेष कौशल वाले अध्यापक की नियुक्ति और
  •  स्कूल भवनों को उनके लिए बाधा मुक्त बनाना।
  • इसमें सबसे खास है, लोगों के दिमाग में यह सोच पैदा करना कि पढ़-लिखकर ये दिव्यांग बच्चे किसी के मोहताज नहीं रहेंगे और समाज की एक उत्पादक इकाई बन सकेंगे।

हालांकि, जब तक स्कूल की इमारतों और कक्षाओं को उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आकार नहीं दिया जाएगा, तब तक दिव्यांग बच्चों के लिए समावेशी, स्तरीय तालीम मुहैया कराने में खास प्रगति हासिल नहीं होने वाली।

Need is facilitative infrastructure:

  • दिव्यांग बच्चों के लिए एक स्कूल की इमारत कैसी होनी चाहिए, इसके लिए सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय व यूनीसेफ ने हाल ही में एक गाइडबुक जारी की है। य
  •  गाइडबुक में बताया गया है कि स्कूल भवन के प्रवेश द्वार व निकासी द्वार पर रैंप है या नहीं, यह जगह समतल है या नहीं, क्या यह बताने वाले साइनबोर्ड हैं या नहीं, स्कूल व शौचालय का फर्श फिसलने वाला तो नहीं है, शौचालय का दरवाजा इतना चौड़ा होना चाहिए कि व्हीलचेयर उसमें आसानी से अंदर जा सके।
  • शौचालय के भीतर टॉयलेट सीट कितनी ऊंचाई पर फिक्स होनी चाहिए।
  • लाइब्रेरी, स्वच्छ पेयजल, मिड डे मील एरिया तक उनकी पहुंच सुगम होनी चाहिए। कक्षा में डेस्क व टेबल आपस में जुडे़ होने से दिव्यांग बच्चों को बहुत दिक्कत होती है। इसी तरह, कक्षाओं में ग्रीन बोर्ड का इस्तेमाल होता है या नहीं, ग्रीन बोर्ड कमजोर नजर वाले बच्चों के लिए खास उपयोगी है, फिर क्लास की खिड़कियां गलियारे में नहीं खुलनी चाहिए, जैसी कई बातें इस गाइडबुक में हैं।

लेकिन प्रश्न यह है की  क्या यह उस देश में संभव है, जहां हमारे ज्यादातर ग्रामीण स्कूल अभी मूलभूत ढांचागत सुविधाओं के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं।