सर्वोच्च अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कहा कि चर्च-कोर्ट के जरिए मिला तलाक कानूनन वैध नहीं है। अदालत ने इस सिलसिले में दायर याचिका खारिज कर दी।
क्या था मामला
कर्नाटक कैथोलिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष क्लारेंस पेस की तरफ से दायर की गई इस याचिका में गिरजाघर-अदालत से मंजूर तलाक कोकानूनी मान्यता देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने चर्च-कोर्ट के फैसलों को कानूनन मान्य ठहराने की मांग करते हुए हवाला दिया था कि देश में केवल मुंबई में तलाक के कोई एक हजार प्रार्थनापत्र गिरजाघर-अदालतों में लंबित हैं। इस पर सर्वोच्च अदालत ने वाजिब ही सवाल किया कि आपसी सहमति से तलाक लेने के इच्छुक ईसाई दंपतियों को अलग रहते हुए दो साल इंतजार करने की बाध्यता क्यों होनी चाहिए, जबकि दूसरे समुदायों के लिए यह अवधि सिर्फ एक साल है? यानी विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग कसौटी नहीं हो सकती।
अदालत का रूख
- अदालत ने कहा कि चर्च-कोर्ट का फैसला संवैधानिक प्रावधान की जगह नहीं ले सकता। ताजा मामले में सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की भी राय मांगी थी।
- याचिका में यह भी दलील दी गई थी कि किसी गिरजाघर द्वारा मंजूर किए गए तलाक को उसी तरह वैध माना जाना चाहिए जैसा कि मुसलमानों के मामले में यानी ‘तीन तलाक’ के सिलसिले में है। लेकिन अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी। वैसे भी तीन तलाक का मामला कुछ महीनों से सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है। जो महिला संगठन तीन तलाक के खिलाफ अभियान चलाते रहे हैं और अदालती लड़ाई भी लड़ते आ रहे हैं उन्हें अदालत के ताजा फैसले से स्वाभाविक ही उम्मीद बंधी होगी। अदालत का फैसला तलाक लेने के इच्छुक ईसाई जोड़ों के लिए भी राहत का संदेश है।
केंद्र का तर्क
केंद्र ने उचित ही याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि ईसाई पर्सनल लॉ को भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1972 और तलाक अधिनियम, 1869 की जगह लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
अदालत के पुर्व फैसले
अदालत ने ताजा फैसले से पहले भी, 1996 में, इसी आशय की व्यवस्था दी थी। तब मोली जोसेफ बनाम जॉर्ज सेबस्टियन के मामले में सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि ‘गिरजाघर-कानून’ का धर्मशास्त्रीय महत्त्व तो हो सकता है, पर वह ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों की बाबत विवाह को रद्द करने का आधार नहीं हो सकता, वह तो संवैधानिक प्रावधान से ही हो सकता है।
विश्लेषण
- अदालत का यह फैसला संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप तो है ही, साथ ही इसे ईसाई महिलाओं के भी पक्ष में कहा जा सकता है। ईसाई विवाह अधिनियम और ईसाई तलाक अधिनियम अंग्रेजों द्वारा बनाए गए हैं जो एक सदी से भी ज्यादा पुराने हैं। इतने लंबे अरसे में समाज काफी बदल चुका है। फिर, चर्च-कोर्ट की भूमिका को संसद से बनाए गए कानूनों की जगह लेने की इजाजत कैसे दी जा सकती है?
- अदालत के ताजा फैसले का मतलब यह नहीं है कि उसने पर्सनल कानूनों को सिरे से खारिज कर दिया है।