पेरिस जलवायु समझौता : भारत ने हामी तो भर दी है लेकिन, असल चुनौती इसके बाद शुरू होती है

पेरिस में हुए जलवायु समझौते पर अमल करते हुए भारत को बहुत बड़ी चुनौतियों से दो-चार होना है. उसे इसकी तैयारी करनी होगी. 

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केंद्र सरकार ने ऐलान किया है कि वह पिछले साल पेरिस में हुए जलवायु समझौते पर दो अक्टूबर को दस्तखत कर देगी. यह फैसला स्वागत योग्य है. यह बताता है कि भारत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की दुनिया की साझा कोशिशों का हिस्सा बनने के लिए प्रतिबद्ध है. 
★दुनिया भी इस बात को समझती है कि भारत के लिए यह काम बेहद चुनौतीपूर्ण है. एक तरफ उसे अपनी विशाल आबादी को गरीबी के दलदल से निकालने के लिए ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाना है तो इसके साथ ही ग्रीन हाउस गैसों का उत्पादन भी घटाना है.

  • अभी भारत ने जो रास्ता अपनाया हुआ है उसमें जीवाश्म ईंधनों पर हमारी निर्भरता कुछ ज्यादा ही है. अब जब जलवायु समझौता अमल में आने की तैयारी में है और सभी देश इस पर सहमत होकर आगे बढ़ रहे हैं तो हमें इस बात पर ध्यान देना होगा. 

यह तय ही लग रहा है कि पेरिस में जो फैसला हुआ है उस पर दस्तखत करने की आखिरी समयसीमा यानी अप्रैल 2017 से पहले अमल शुरू हो जाएगा. कुल उत्सर्जन के 47.79 हिस्से के लिए जिम्मेदार 61 देशों ने इस पर अब तक दस्तखत कर दिए हैं. 

  • अब बचते हैं यूरोप के कुछ देश और यूरोपीय संघ जिसे ब्रिटेन के संघ से बाहर निकल जाने के बाद अपने लक्ष्यों की समीक्षा करनी है.
  • लक्ष्य यह है कि ग्रीन हाउस गैसों के कुल वैश्विक उत्सर्जन के 55 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार देश इस समझौते पर दस्तखत कर दें. परमाणू आपूर्तिकर्ता समूह में प्रवेश न मिलने के बाद भारत ने पेरिस समझौते पर जो अनिच्छा दिखाई थी उसे पीछे छोड़कर उसने प्रशंसनीय काम किया है. हालांकि आखिर में उसे ऐसा करना ही पड़ता क्योंकि यूरोप के आने के बाद पेरिस समझौते का आगे बढ़ना तय था
  • जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कोई देश अपनी प्रतिबद्धताओं से अब पीछे नहीं हट सकता. इसलिए स्वच्छ ईंधन पर अपनी निर्भरता बढ़ाने के लिए हमें राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत है. पेरिस समझौते पर अमल के बाद आने वाले वर्षों में ऊर्जा के इस्तेमाल के हर पहलू की बारीकी से निगरानी करनी होगी. 
  • हमारी अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र अभी तकनीकी रूप से इस काम के लिए सक्षम नहीं हैं. हमें अपनी बिजली ग्रिड को इस तरह सुधारना होगा कि इसमें स्वच्छ ऊर्जा का प्रवाह बढ़े. यह जल्द से जल्द किए जाने की जरूरत है क्योंकि भारत ने 2022 तक 100 गीगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन का जो लक्ष्य तय किया है उस तक पहुंचना ग्रिड की क्षमताओं में सुधार के बिना संभव नहीं होगा. 
  • फैक्ट्रियों और गाड़ियों से निकलने वाले धुएं को रोकने के लिए एक नई और सख्त नीति बनानी होगी.
  • इस तरह के बड़े कदम तभी उठाए जा सकते हैं जब राज्य सरकारें भी सक्रियता के साथ इस काम में सहयोग करें. अभी तो उनमें से कई इस चर्चा में ठीक से शामिल तक नहीं हो पाए हैं.
  • यह स्थिति बदलनी होगी और कार्रवाई के लिए एक ब्लूप्रिंट तैयार करना होगा. तभी 100 अरब डॉलर सालाना वाले उस कोष से एक बड़ी रकम पाने का हमारा दावा मजबूत होगा जिसे दुनिया के अमीर देशों ने 2020 तक वजूद में लाने का वादा किया है. 
  • बुनियादी रूप से देखा जाए तो एक ऐसी राष्ट्रीय नीति बननी चाहए जो जीवाश्म ईंधनों पर और ज्यादा टैक्स लगाए और इससे मिले पैसे को सोलर पैनलों, एलईडी, साइकिलों और पर्यावरण के लिए अनुकूल ऐसे ही विकल्पों को प्रोत्साहन देने पर खर्च किया जाए

 

reference: http://m.thehindu.com/opinion/editorial/editorial-on-indias-ratification-of-paris-agreement-joining-the-climate-high-table/article9150724.ece 

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