#The_Economics_Times की संपादकीय
भारत में दवाओं को मंजूरी देने और उनके कारोबार पर नजर रखने की जो व्यवस्था है उसका होना न होना बराबर है. रैनबैक्सी के घोटाले को दुनिया के सामने लाने वाले और स्वास्थ्य कार्यकर्ता दिनेश ठाकुर की एक हालिया रिपोर्ट कुछ ऐसा ही संकेत करती है. इसके मुताबिक दवा उद्योग पर निगरानी रखने वाली व्यवस्था की कमियों और इसमें चल रही गड़बड़ियों को फौरन दुरुस्त करने की जरूरत है.
Problem in India:
- दवा कारोबार के नियमन की बात करें तो देश में यह व्यवस्था काफी बिखरी हुई है. हमारे यहां दवा उत्पादन का लाइसेंस देने वाली 36 इकाइयां हैं जो अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैली हुई हैं. कोई भी उत्पादक एक राज्य से लाइसेंस लेकर अपनी दवा पूरे देश में बेच सकता है.
- अगर किसी दवा का कोई बैच निर्धारित से कम गुणवत्ता का (एनएसक्यू) हो तो इसके असर देश और इसके बाहर तक हो सकते हैं. रिपोर्ट में ऐसे कई अध्ययनों का हवाला दिया गया है जो कहते हैं कि देश में खरीदी जाने वाली दवाओं का 20 फीसदी या उससे ज्यादा हिस्सा ऐसा ही है.
Institutional mechanism that exist today:
- नियमित रूप से दवाओं के सैंपल लेना और उनकी जांच करना द सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) और राज्य स्तर पर इस तरह की संस्थाओं का काम है.
- लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक यह काम अवैज्ञानिक और अपारदर्शी तरीके से किया जाता है. भारत में दुनिया की फार्मेसी बनने की क्षमता है. लेकिन यही हालत रही तो ऐसा होना बहुत दूर की कौड़ी है.
What needs to be done:
इसलिए जरूरत इस बात की है कि नियमन और निगरानी की इस व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव हो. ठाकुर की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर किसी राज्य में दवा का कोई घटिया सैंपल मिलता है तो ऐसा कोई जरिया नहीं है जिससे देश भर से उस दवा का पूरा बैच वापस लिया जा सके.
★साफ है कि हमें एक ज्यादा केंद्रीय नियामक की जरूरत है. रिपोर्ट के लिए यह काम सीधे-सीधे ड्रग्स एंड कॉसमेटिक रूल 1945 को सुधार कर हो सकता है.
★ इसमें यह भी कहा गया है कि एनएसक्यू का एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाए ताकि उत्पादकों की विश्वसनीयता कभी भी जांची जा सके. रिपोर्ट के मुताबिक दवाओं की सरकारी खरीद के लिए भी अलग से कानून बनना चाहिए ताकि उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके.
★ कुल मिलाकर बात का सार यह है कि हमें फार्मा क्षेत्र की नियामक व्यवस्था में सुधार के मोर्चे पर अग्रसक्रियता दिखानी होगी. तभी लोगों का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और दवा कारोबार का भी.
