COVID19 : Outcome and indicator of ecological disaster

 

CONTEXT:

कोरोनावायरस (कोविड-19) महामारी का पूरी दुनिया में प्रसार जारी है और यह पहले ही विकराल स्वास्थ्य संकट बन चुका है। अब इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी असर डालना शुरू कर दिया है जिससे उत्पादन, यात्रा और व्यापार की व्यवस्थाएं तार-तार हो रही हैं। संभव है कि एक साल के भीतर इसका प्रभावी टीका विकसित किया जा सकता है लेकिन तब तक बहुत देर हो जाएगी और यह एक विकट महामारी का रूप ले चुकी होगी। इस संकट से निपटने के लिए इसके गहरे निहितार्थ पर विचार करने की जरूरत है।

 

कोविड-19 एक व्यापक पारिस्थितिकी संकट का लक्षण है जिससे मानव अस्तित्व के लिए खतरा है। इसके कई कारण हैं। जैव विविधता की कीमत पर प्रजातियों के मानकीकरण पर आाधारित कृषि और पशुपालन का औद्योगीकरण बढ़ता जा रहा है। वन्य प्राणियों का प्राकृतिक पर्यावास सिकुड़ता जा रहा है जिससे वे इंसानी बस्तियों में आ रहे हैं। साथ ही इंसानों का अनजाने में ही सही, ऐसे जीवों के संपर्क हो रहा है जिनसे बचने में लिए उनके शरीर में प्रतिरोधक क्षमता नहीं है। इन्हीं सबका अपरिहार्य नतीजा हमारे सामने कोविड-19 के रूप में मौजूद है। 

 

 भारी मात्रा में उत्पादन की औद्योगिक तकनीकों के कारण यह स्थिति आ गई है कि बड़ी संख्या में मुर्गियों और पशुओं को तंग जगहों पर रखा जाता है। इस तरह अगर एक जानवर को भी संक्रमण होगा तो वह बहुत तेजी से फैलेगा। स्वाइन फ्लू और एवियन फ्लू इसके उदाहरण हैं। सूअरों और मुर्गियों से यह बीमारी फिर इंसानों में आती है। इस तरह के जोखिम को कम करने के लिए जानवरों को नियमित रूप से एंटीबायोटिक्स दिया जाता है। यह एंटीबायोटिक्स फिर खाद्य शृंखला में आ जाता है और इंसानी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालता है। कृषि और पशुपालन के औद्योगीकरण ने भले ही खाद्य सुरक्षा को बढ़ाया है लेकिन यह स्वास्थ्य सुरक्षा में एक नकारात्मक फीडबैक लूप बनाता है। 

All Ecological concerns Intigreted

सच्चाई यह है कि आज इंसान को कई मोर्चों पर संकट का सामना करना पड़ रहा है जैसे जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय क्षरण, पानी की कमी, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा और सामाजिक तथा आर्थिक असमानता शामिल है। ये सभी संकट एकदूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं। कभी-कभी पारस्परिक रूप से एकदूसरे को मजबूत करते हैं और अभी एकदूसरे का प्रभाव कम करते हैं। ये हमारी जीवनशैली, मूल्यों, अतीत की हमारी समझ और भविष्य की आकांक्षाओं से जुड़ी गहरी सभ्यतागत खामियों के लक्षण हैं। हर संकट को अलग मानकर उससे निपटने की योजना काम नहीं करेगी क्योंकि फीडबैक लूप के जरिये उसका दायरा बहुत व्यापक है। कोविड-19 जैसा संकट हमारे ग्रह की पारिस्थितिकी का एक हिस्सा हो सकता है लेकिन संभव है कि इसका संबंध दूसरे क्षेत्रों में हो रही घटनाओं से हो सकता है। हालांकि इसका असर तुरंत देखने को नहीं मिल सकता है। यहां एक अंतरनिर्भर आकस्मिक शृंखला काम कर रही थी। कोविड-19 विषाणु अमूमन जंगल में रहने वाले जीवों में रहता है। इस मामले में यह जंगली चमगादड़ से आया है। ये चमगादड़ चीन में वुहान के खाद्य बाजार में रखे गए जानवरों के संपर्क में आया जिससे इनके प्रसार का खतरा बढ़ गया। 

 

इन जानवरों को औद्योगिक रूप से तैयार किया गया था। खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए दूसरे क्षेत्रों पर परिणाम की परवाह किए बिना विकसित की गई इन प्रक्रियाओं में यह जोखिम अंतर्निहित है। चुनौतियों को व्यापक परिपेक्ष्य में नहीं देख पाने की हमारी कमजोरी मौजूदा ज्ञान व्यवस्थाओं में अंतरनिहित है जो स्पेशलाइजेशन के बढऩे और व्यापक परिदृश्य पर जोर देने से लगातार बढ़ रहा है। इसकी बड़ी तस्वीर पृथ्वी की नाजुक पारिस्थितिकी को साथ बांधने वाली असंख्य कडिय़ों की जानकारी है। पारिस्थितिकी के एक हिस्से में छोटी सी हलचल दूसरे हिस्सों में व्यापक तबाही ला सकती है। लेकिन यह सच्चाई तेजी से अस्पष्ट हो गई है और सामूहिक अंधेपन के आवेश में इसे नकारा जा रहा है। इसका कारण खोजना मुश्किल नहीं है। इस सच्चाई को स्वीकार करने का मतलब होगा कि हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव करना होगा, अपने मूल्यों को बदलना होगा और इंसानियत को प्रकृति से जोडऩा होगा। 

 

मानव प्रकृति है, न कि मानव प्रकृति के खिलाफ है जो कि औद्योगिक दौर का मूलमंत्र रहा है। जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी समिति की रिपोर्ट में पेरिस समझौते में शामिल आकांक्षी लक्ष्यों के प्रभावों की समीक्षा की गई है। इस समझौते में धरती के तापमान में वृद्धि को औद्योगिक क्रांति की शुुरुआत की तुलना में केवल 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड रखने की बात कही गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हम पहले ही 1.5 डिग्री की सीमा पर पहुंचने के कगार पर हैं और जलवायु उथलपुथल के लिए इतना ही काफी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती को बढ़ते तापमान से बचाने के लिए न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था में बल्कि समाज में भी कायाकल्प की जरूरत होगी। सभ्यतागत प्रतिक्रिया को प्रभावित किए बिना सामाजिक बदलाव संभव नहीं है। 

 

हम प्रौद्योगिकी के दौर में रह रहे हैं। यह एक व्यापक धारणा है कि प्रौद्योगिकी हमारे समक्ष मौजूद संकटों का कुछ न कुछ समाधान ढूंढ लेगी और इसके लिए हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव नहीं करना पड़ेगा। कृत्रिम मेधा और मशीन लर्निंग की नई दुनिया आने को तैयार है। क्वांटम कंप्यूटिंग और जेनिटिक इंजीनियरिंग में चमत्कार हो रहे हैं। भविष्य की प्रौद्योगिकी प्रगति के नतीजे इंसान पर बहुत हावी हो सकते हैं।  यह हो सकता है। लेकिन क्या हमारा ग्रह और पृथ्वी पर जीवन प्रौद्योगिकी के इस चमत्कार को देखने के लिए जिंदा बचेंगे? उदाहरण के लिए क्या यह संभव नहीं है कि कोई विषाणु उसका टीका विकसित होने से पहले ही दुनिया की आबादी को खत्म कर दे? शायद कोविड-19 पारिस्थितिकी आपदा के लिए खतरे की घंटी है जिस पर हम ध्यान नहीं दे रहे हैं। 

 

पारिस्थिकीय संकट से निपटने के लिए इंसान की योजना क्या होनी चाहिए?

  • हमें प्रकृति को एक जीवित स्रोत की तरह देखना चाहिए और उसका उतना दोहन नहीं करना चाहिए कि उसका अस्तित्व की खतरे में पड़ जाए। पृथ्वी पर सभी जीव जंतुओं का अस्तित्व बनाए रखने के लिए जैवविविधता बुनियादी जरूरत है और इसका हर हाल में संरक्षण होना चाहिए।  
  • हम जिस तरह एकदूसरे को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उसके लिए वैश्विक स्तर पर एक व्यापक और समन्वित योजना की जरूरत है। अधिकारप्राप्त अंतरराष्ट्रीय संचालन संस्थाओं के जरिये चलने वाली बहुस्तरीय प्रक्रियाओं का कोई विकल्प नहीं है। सबसे अहम बात यह है कि हमें समृद्धि की एक नई परिभाषा की जरूरत है जो सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए ताजा पानी और घूमने के लिए हरी भरी पृथ्वी को अहमियत दे।

Reference: Business Standard

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