महिलाओं के पक्ष में ‘तीन तलाक असांविधानिक

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‘तीन तलाक’ पर प्रतिबंध लगाने की मांग मनवाने के लिए मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने 22 अगस्त को फैसला सुना दिया। ‘तीन तलाक’, ‘जुबानी तलाक’ व ‘एकतरफा’ दिए जाने वाले तलाक के विरोधियों के अनुसार 90 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं ‘तीन तलाक’ तथा ‘निकाह हलाला’ के विरुद्ध हैं।

  • 2015 में महिला अधिकारों बारे एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं की हालत का संज्ञान लेते हुए कहा था कि ‘‘तीन तलाक, ‘निकाह हलाला’ तथा ‘मर्दों को चार शादियों की इजाज़त’ पर सुनवाई जरूरी है।’’
  • इसी बारे ‘तीन तलाक’ पीड़िता सायरा बानो, जिसका उसके पति ने 6 बार गर्भपात करवाया तथा अन्य याचिकाकत्र्ता महिलाओं ने अदालत से यह प्रथा रद्द करने की गत वर्ष गुहार लगाई जिसका अनेक संगठनों ने समर्थन किया।

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यत: 2 प्रश्रों पर ध्यान केंद्रित किया

  •  (1) क्या तीन तलाक इस्लाम का मौलिक हिस्सा है अर्थात क्या इसके बिना इस्लाम का स्वरूप बिगड़ जाएगा और
  • (2) क्या पुरुषों को प्राप्त तीन तलाक का अधिकार मुस्लिम महिलाओं के समानता और सम्मान के अधिकार के विरुद्ध है?

अदालत ने तीन तलाक को संविधान के अनुच्छेद 14 के आधार पर असंवैधानिक ठहराया है। यह अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता का भरोसा दिलाता है तीन तलाक प्रथा को अदालत में चुनौती कई मुसलिम महिलाओं ने दी थी।

View of Muslim Personal Law board

  • मुस्लिम महिलाओं की दलीलों का केन्द्र सरकार ने भी समर्थन किया परन्तु मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे धार्मिक मसला बताते हुए इस पर सुनवाई न करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की पीठ ने 11 मई, 2017 से 18 मई को सुनवाई पूरी होने तक ‘तीन तलाक’ के पक्ष और विपक्ष में 6 दिनों तक सभी पक्षों की दलीलें सुनीं।
  • ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ व ‘जमीयत उलेमा-ए-हिन्द’ जैसे संगठनों ने इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जोड़ते हुए कहा,‘‘मुस्लिमों की हालत एक चिडिय़ा जैसी है जिसे ‘गोल्डन ईगल’ यानी बहुसंख्यक दबोचना चाहते हैं। आशा है चिडिय़ा को घोंसले तक पहुंचाने के लिए अदालत न्याय करेगी।’’

 

Reply of Central Government

  • इसके जवाब में केंद्र सरकार ने कहा था कि‘‘यहां तो टकराव मुसलमान महिलाओं तथा पुरुषों के बीच ही है।’’
  •  ‘कोर्ट के मददगार’ अर्थात ‘एमीकस क्यूरी’ के रूप में वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद ने बताया कि ‘‘तलाक-ए-बिद्दत की व्यवस्था मूल इस्लाम में नहीं है तथा सऊदी अरब, ईरान, ईराक, लीबिया, मिस्र, सूडान, बंगलादेश और पाकिस्तान सहित 21 मुस्लिम देश इसे रद्द कर चुके हैं। एक साथ तीन तलाक कहना खुदा की नजर में गुनाह है, लेकिन पर्सनल लॉ में जायज है।’’

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर और न्यायमूर्ति अब्दुल नजीर ने इसे असंवैधानिक करार नहीं दिया परन्तु 3 न्यायाधीशों आर.एफ नरीमन, कुरियन जोसेफ और यू.यू. ललित ने इसे असंवैधानिक करार दिया और अल्पमत के निर्णय में यह भी कहा गया कि केन्द्र 6 महीने के भीतर कानून नहीं बनाता तो तीन तलाक पर यह अंतरिम रोक जारी रहेगी।

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मुसलमान महिलाओं के लिए बड़ा राहतकारी कदम बताया जा रहा है ‘‘जिससे उनके लिए स्वाभिमान पूर्ण एवं समानता के एक नए युग की शुरूआत हुई है। यह उनके समानता के अधिकार और मूलभूत संवैधानिक अधिकारों की विजय है।’’

Way ahead

अब जहां सरकार जल्द से जल्द इस संबंध में कानून बनाएगी वहीं इस फैसले को देश में समान आचार संहिता लागू करने के केन्द्र सरकार के प्रयासों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। भविष्य में घटनाक्रम जो भी स्वरूप धारण करें, अभी तो मुसलमान बहनों को एक ‘अनुचित परम्परा’ से मुक्ति का जश्र मनाने का अवसर सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध करा दिया है।

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मुस्लिम पर्सनल लॉ : तलाक-तलाक-तलाक के पेंच और केंद्र सरकार की पहल

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