दक्षिण कोरिया महामारी नियंत्रण में मिसाल

#SOUTH KOREA लॉकडाउन को टालने में सफल रहा और उसने अपना बिजनेस भी बंद नहीं किया। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका बड़ा कारण यह है कि उसने आक्रामक ढंग से टेस्टिंग और Contact Tracing की।

 

LESSON FROM PAST

  • यह सब उसने पांच साल पहले देश में मेर्स (मिडल ईस्ट रेस्पिरेट्री सिंड्रोम) के प्रकोप से मिले अनुभव से सीखा। वर्ष 2015 में फैली इस बीमारी से 200 लोग मर गए थे।
  • इस प्रकोप के बाद साउथ कोरिया ने अपने संक्रामक रोग कानून में संशोधन किया। इन संशोधनों के बाद उसे संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए विस्तृत व्यक्तिगत जानकारियां हासिल करने का अधिकार मिल गया।
  • प्राइवेसी के अधिकारों के हनन के आरोपों के बावजूद साउथ कोरिया ने कांटेक्ट ट्रेसिंग के लिए जीपीएस, स्मार्टफोन, क्रेडिट कार्ड रिकार्ड्स और सर्विलांस वीडियो जैसे टूल्स का जमकर इस्तेमाल किया।
  • निदान से पहले लोगों की हलचल को वेबसाइट्स पर प्रकाशित किया जाता है और स्मार्टफोन अलर्ट के जरिए यह जानकारी दूसरे लोगों तक भेजी जाती है ताकि ऐसे लोगों का पता लगाया जा सके, जिनका सामना वायरस के वाहक से हुआ हो। साउथ कोरिया घरों में क्वारंटाइन में रह रहे हजारों लोगों की ट्रैकिंग के लिए स्मार्टफोन के ट्रैकिंग एप्स का प्रयोग कर रहा है। वह क्वारंटाइन के आदेश का उल्लंघन करने वाले लोगों पर इलेक्ट्रॉनिक रिस्टबैंड के उपयोग की भी योजना बना रहा है।

 


बहुत भीड़भाड़ वाले आयोजन भी रोगों के प्रसार का एक बड़ा कारण बन सकते हैं। अभी हाल में किए गए अध्ययन में एक चौंकाने वाली यह बात सामने आई है कि विदेशों में 25000 से अधिक लोगों की उपस्थिति वाले समारोहों से सांस की बीमारी का जोखिम बहुत बढ़ जाता है। दुनिया में फैली कोरोना वायरस की महामारी के संदर्भ में यह अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण है। रिसर्चरों ने 28 देशों के 68 अस्पतालों में अगस्त 2015 से लेकर अप्रैल 2019 तक हुए दाखिलों का अध्ययन किया। उनका मकसद यह जानना था कि विदेशों में होने वाले आयोजनों में भाग लेने से मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने पता लगाया कि किसी अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल होकर स्वदेश लौटने वाले जिन लोगों ने चिकित्सीय सहायता ली, उनमें से 80 प्रतिशत को सांस संबंधी तकलीफ हो गई। रिसर्चरों ने देखा है कि इनमें 26 प्रतिशत मरीज इन्फ्लूएंजा से पीड़ित थे जबकि 20 प्रतिशत लोगों को निमोनिया हुआ। कुल 260 मरीज ऐसी बीमारी से पीड़ित हुए जो उन्हें विदेशी आयोजनों से लगी थीं। इनमें से 77.9 प्रतिशत बीमारियां सांस से संबंधित थीं जबकि 4.6 प्रतिशत को आंत संबंधित रोग हुए।


यह अध्ययन ट्रैवल मेडिसिन एंड इंफेक्शस डिजीज पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में आंकड़े कोविड-19 के फैलने से पहले एकत्र किए गए थे। रिसर्चरों ने एक खास बात यह नोट की कि इन बीमारियों में सबसे बड़ा योगदान मक्का की हजयात्रा का था। हज या उमराह के दौरान किसी रोगाणु की चपेट में आने वाले व्यक्ति की औसत उम्र 57 साल थी। नौ मामले ओलिंपिक खेलों से जुड़े पाए गए लेकिन रिसर्चरों का मानना है कि ये मामले खेलों में भाग लेने से नहीं हुए। इनका संबंध यात्रा से है। अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) ने 15 मार्च को जारी अपनी गाइड लाइन में कहा था कि बड़े स्तर पर होने वाले आयोजनों से कोरोना वायरस फैल सकता है। यह वायरस उन लोगों द्वारा फैलाया जा सकता है जो इन आयोजनो में भाग लेने के लिए विदेशों से आते हैं। ऐसे लोग स्थानीय लोगों को संक्रमित कर सकते हैं।
भारत में कोरोना के मामलों में जो वृद्धि हुई उसमें दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज मस्जिद में आयोजित तब्लीगी जमात का जलसा भी एक बड़ा कारण रहा। इस जलसे में न सिर्फ देश के विभिन्न राज्यों के लोग भारी संख्या में मौजूद थे, बल्कि विदेशी लोग भी अच्छी खासी संख्या में उपस्थित थे। लोगों से ठसासस भरी इमारत वायरस प्रसार का मुख्य केंद्र बन गई। इसी तरह दक्षिण कोरिया में वायरस शिनचियोंजी चर्च की वजह से फैला। फ्रांस में अकेले एक चर्च से 2000 लोग संक्रमित हो गए। 2016 में रियो ओलिंपिक के आयोजन के वक्त जीका वायरस सुर्खियों में आया था। उस समय यह वायरस न सिर्फ ब्राजील में फैला हुआ था, बल्कि उत्तर और दक्षिण अमेरिका के कई देशों में इसके मामले पहुंच गए थे। सबसे पहले यह वायरस प्रशांत महासागर के कुछ द्वीपों तक ही सीमित था। समझा जाता है कि 2014 में ब्राजील में विश्व कप फुटबाल में भाग लेने आए किसी संक्रमित व्यक्ति ने यह वायरस फैलाया था।

Reference:https://www.dainiktribuneonline.com/

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