क्या पानी को संविधान की समवर्ती सूची में डालने का समय आ गया है?

- भूजल स्तर में लगातार गिरावट आने, शहरों का विस्तार होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं की कमी, जलवायु परिवर्तन, देश के 20 राज्यों में जल विषाक्तता के बीच जल के समुचित उपयोग एवं संरक्षण को लेकर एक समग्र, व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग के साथ ही जल को संविधान की समवर्ती सूची में रखने के विचार पर बहस शुरू हो गई है।

- जल के उपयोग के बारे में भारत के गांव-समाज को अपना दायित्व हमेशा से स्पष्ट था। जब तक हमारे शहरों में पानी की पाइप लाइन नहीं पहुंची थी, तब तक यह दायित्वपूर्ति शहरी भारतीय समुदाय को भी स्पष्ट थी, किन्तु पानी के अधिकार को लेकर अस्पष्टता हमेशा बनी रही।

 

  • जल का विषय किसके पास रहे, इसके लेकर अस्पष्टता रही है । जल के बारे में यह अस्पष्टता, प्रश्न करने वाले यक्ष और जवाब देने वाले पाण्डु पुत्रों के बीच हुई बहस का भी मुद्दा रही थी। और वह सवाल आज भी कायम हैं कि कौन सा पानी किसका है ? बारिश की बूंदों पर किसका हक है? नदी-समुद्र का पानी किसका है ? तल, भूतल, सतह, पाताल का पानी किसका है ? सरकार का पानी पर स्वामित्व है या वह सिर्फ ट्रस्टी है? यदि ट्रस्टी, सौंपी गई सम्पत्ति की ठीक से देखभाल न करे, तो क्या हमें हक है कि हम ट्रस्टी बदल दें?

क्यों जरुरी है जल को समवर्ती सूचि में लाना :-

  • पानी की हकदारी को लेकर उठे सवालों के बीच जल संसाधन सम्बन्धी संसद की एक स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में पानी को समवर्ती सूची में शामिल करने की बात को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा कई वर्गो का भी मत है कि यदि पानी पर राज्यों के बदले, केन्द्र का अधिकार हो, तो बाढ़-सुखाड़ जैसी स्थितियों से बेहतर ढंग से निपटना सम्भव होगा।
  • लेकिन सवाल उठता है कि क्या वाकई यह होगा? जल को समवर्ती सूची के अंतर्गत लाने से केंद्र के हाथ में कुछ संवैधानिक शक्ति आ जायेंगी। इससे देश में जल से जुड़ी समस्याओं से निपटने में मदद मिलेगी। साथ ही राष्ट्रीय संसाधनों का राष्ट्रीय हित में उपयोग निश्चित ही लाभकारी रहेगा। 

- पानी के प्रबंधन का विकेन्द्रित होना अच्छा है या केन्द्रीकरण होना? समवर्ती सूची में आने से पानी पर एकाधिकार, तानाशाही बढ़ेगी या घटेगी? बाजार का रास्ता आसान हो जाएगा या कठिन? वर्तमान संवैधानिक स्थिति के अनुसार जमीन के नीचे का पानी उसका है, जिसकी जमीन है। सतही जल के मामले में अलग-अलग राज्यों में थोड़ी भिन्नता जरूर है, किन्तु सामान्य नियम है कि निजी भूमि पर बनी जल संरचना का मालिक, निजी भूमिधर होता है।

  • इस तरह आज की संवैधानिक स्थिति में पानी, राज्य का विषय है। केन्द्र सरकार, पानी को लेकर राज्यों को मार्गदर्शन निर्देश जारी कर सकती है और पानी को लेकर केन्द्रीय जलनीति व केन्द्रीय जल कानून बना सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह मानने के लिये राज्य सरकारों को बाध्य नहीं कर सकती।
  • केन्द्र सरकार द्वारा जल रोकथाम एवं नियंत्रण कानून-1974 की धारा 58 के तहत केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केन्द्रीय भूजल बोर्ड और केन्द्रीय जल आयोग का गठन किया गया । इसकी धारा 61 केन्द्र को केन्द्रीय भूजल बोर्ड आदि के पुनर्गठन का अधिकार देती है और धारा 63 जल सम्बन्धी ऐसे केन्द्रीय बोडरे के लिये नियम-कायदे बनाने का अधिकार केन्द्र के पास सुरक्षित करती है।

 

  • केन्द्रीय जलनीति हो या जल कानून, वे पूरे देश में एक समान लागू होंगे। पानी के समवर्ती सूची में आने के बाद केन्द्र द्वारा बनाए जल कानून के समक्ष, राज्यों के सम्बन्धित कानून निष्प्रभावी हो जायेगा। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि जल को समवर्ती सूची में रखने से जल बंटवारा विवाद में केन्द्र का निर्णय अन्तिम होगा।
  • नदी जोड़ो परियोजना के सम्बन्ध में अपनी आपत्ति को लेकर अड़ जाने से अधिकार समाप्त हो जाएगा। केन्द्र सरकार, नदी जोड़ो परियोजना को बेरोक-टोक पूरा कर सकेगी।

 

  • यह तर्क इसलिए भी दिये जा रहे क्योंकि केन्द्र सरकार सम्भवत: नदी जोड़ो परियोजना को भारत की बाढ़-सूखे की समस्याओं का हल मानती है।
  • जल संरक्षण के बिना जीवन नहीं है इसलिये हिमालय से निकलने वाली विभिन्न प्राकृतिक जल धाराओं व जलस्रोतों का संरक्षण करना अनिवार्य है। मूल निवासियों की जरूरतों के अनुरूप जल-जंगल-ज़मीन के संरक्षण के लिये कार्ययोजना बननी चाहिए। हिमालयी राज्यों में जल संरक्षण के लोक ज्ञान को समाहित करने की जरूरत है।

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