Resetting china policy

 

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बीते कुछ सप्ताह के दौरान ‘चाइना रीसेट’ शब्द बार-बार सामने आया। यहां मूलतया तात्पर्य यह है कि बीते कुछ वर्षों के दौरान अमेरिका की ओर झुकाव नजर आने के बाद और गत वर्ष डोकलाम में चीन के साथ तनाव, बेल्ट और रोड समिट तथा मसूद अजहर से जुड़े मुद्दों पर लगातार विवाद के बाद भारत अब अपने इस उत्तरी पड़ोसी देश के साथ एकतरफा ढंग से मित्रवत रुख अपनाएगा। इस संबंध में सी राजा मोहन ने पिछले महीने एक स्तंभ लिखा था लेकिन अब तक इस बारे में आधिकारिक रूप से कोई बात नहीं कही गई है। है।

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हम यह अवश्य जानते हैं कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार मालदीव में हो रहे भड़काऊ घटनाक्रम को लेकर लापरवाह बनी हुई है। मालदीव में चीन के समर्थन वाले तानाशाही शासन ने पूरी धृष्टïता से भारत की आकांक्षाओं को धता बताया है। उसने पाकिस्तानी सेना प्रमुख की मालदीव यात्रा की मेजबानी की, भारत द्वारा तोहफे में दिए गए एएलएच हेलीकॉप्टर को वापस लौटा दिया और यह भी कहा कि पाकिस्तानी नौसेना उसके विशिष्टï आर्थिक क्षेत्र की निगरानी कर सकती है। हम जानते हैं कि भारत चीन द्वारा डोकलाम में किए गए नए निर्माण का मसला उठाने को भी तैयार नहीं है। उसकी दलील है कि उसने हमारी सीमा का अतिक्रमण नहीं किया है। सरकार द्वारा तिब्बत की वर्षगांठ पर आयोजित एक समारोह में आधिकारिक उपस्थिति को कम करने के निर्देशों को लेकर भी विवाद उत्पन्न हुआ था

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अभी यह स्पष्टï नहीं है कि सरकार का यह रुख चीन संबंधी नीति के पुनर्निर्धारण से संबंधित है या नहीं लेकिन डोकलाम-2 और तिब्बत का मामला बताता है कि मोदी सरकार के रुख में बदलाव आया है। मालदीव का घटनाक्रम भी इस कड़ी में प्रतीत होता है। ऐसे में हमें इस बात पर यकीन करना चाहिए कि भारत की सोच में बदलाव आ रहा है। राजा मोहन ने अपनी बात पर बल देते हुए कहा है, ‘हकीकत यह है कि चीन भारत (बल्कि अन्य देशों की) की तुलना में स्पष्टï रूप से शक्तिशाली है। उसकी ताकत में नाटकीय ढंग से इजाफा हुआ है। यह उसकी दशकों लंबी आर्थिक सुधार और आर्थिक वृद्घि की प्रक्रिया का नतीजा है।’

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ताकत के मामले में चीन तेजी से आगे निकल रहा है, वैश्विक स्तर पर उसकी पहुंच बहुत बढ़ी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका कद भी बढ़ा है। जाहिर है चीन को अब भारत की चिंताओं से बहुत कम मतलब होगा। ऐसे में भारत के पास जो नीतिगत विकल्प बचे हैं वे परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होते हैं।

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  • भारत को चीन की बढ़ती छाप के बीच न केवल अपने लिए सामरिक गुंजाइश बचाकर रखनी होगी बल्कि इसके साथ-साथ उसे विभिन्न विवादों से बचकर भी निकलना होगा।
  • अगर चीन के साथ संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करना है तो उसके लिए हमें सहयोग के दायरे में विस्तार करना होगा ताकि कई नकारात्मक कारकों के बरअक्स संतुलन कायम किया जा सके। यह संतुलन उन कारकों के क्षेत्र में जरूरी है जो द्विपक्षीय रिश्तों को अस्थिर करते आए हैं।

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अब जरा इसके नफा-नुकसान पर बात करते हैं। सकारात्मक पहलू देखें तो ऐसा करने से विवाद का जोखिम कम हो जाएगा, बशर्ते कि भारत खुद इसे न बढ़ाए। चूंकि ऐसे विवाद भारत के हित में नहीं हैं इसलिए इनसे बचना ही बेहतर है। इसके अलावा अगर गतिरोध खत्म होता है तो लंबित सीमा विवादों पर भी हम आगे बढ़ सकेंगे। यह हमारे लिए बेहतर होगा क्योंकि इससे हमें अपने रक्षा संसाधनों की प्राथमिकता नए सिरे से तय करने में मदद मिलेगी। एक विश्लेषक ने हाल ही में मुझसे कहा कि अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हम चीन के साथ संघर्ष वाले देशों की चौकड़ी का हिस्सा बन जाते हैं। इसलिए दूसरों के झगड़ों में न पडऩा हमारे लिए बेहतर होगा। अपने सबसे बड़े पड़ोसी के साथ अविश्वास की खाई पाटना बहुत अच्छी बात है। इससे भारत और चीन के लिए यह संभावना पैदा होती है कि वे अंतरराष्ट्रीय मसलों पर सहयोग कर सकें।

आखिर में, एक राजनीतिक पहलू भी है। भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि चीन के साथ लड़ाई करके वह अगले चुनाव की अपनी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाए। चीन के साथ रिश्ते दोबारा परिभाषित करना उसके लिए मददगार हो सकता है। दूसरी ओर कुछ नकारात्मक पहलू भी हैं। चीन के साथ भारत अगर रिश्ते सुधारता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि चीन भी ऐसा ही सोचे। शी चिनफिंग के नेतृत्व वाली सरकार यह भी मान सकती है कि भारत ऐसा करके सबक सीख रहा है। एकपक्षीय रियायतें शायद ही मांग को बढ़ाने का काम करें।

चीन इस अवसर को जाने नहीं देगा और डोकलाम तथा अन्य स्थानों पर अपनी सैन्य मौजूदगी को मजबूत करेगा। पाकिस्तानी या चीनी सैनिक और जहाज मालदीव पहुंच कर रुक रहे हैं। यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को सीधा खतरा है। पूर्वी अफ्रीका से लेकर दक्षिण पूर्वी एशिया तक के देशों को जब लगेगा कि भारत चीन के मुकाबिल खड़ा नहीं है तो इससे भू राजनैतिक हालात पर असर पड़ेगा। इतना ही नहीं ऐसा करके हम अमेरिका के साथ संबंध बढ़ाने की दो दशक लंबी प्रक्रिया को भी उलट देंगे। जबकि इससे हमें तमाम सामरिक लाभ हुए हैं। संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने से हमें कोई आर्थिक लाभ नहीं होगा, हम बस चीन के अनुषंगी बन जाएंगे।

दूसरे शब्दों में कहें तो चीन को यह प्रोत्साहन नहीं मिलेगा कि भारत को कोई लाभ हो। राजा मोहन कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि यह विशुद्घ चुनावी दृष्टिï से उठाया जा सकता है। घरेलू राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।’ इसलिए मोदी सरकार को चीन के साथ नए सिरे से संबंध कायम करने के बजाय अपनी उस क्षमता का इस्तेमाल करना चाहिए जिसके तहत वह अमेरिका और चीन के बीच संघर्ष को बढ़ाने में ऐसी शक्ति का काम कर सकता है जो दोनों में से जिसे चाहे मजबूत बना सकती है। हमें उन दोनों के आपसी रिश्तों से ज्यादा बेहतर रिश्ते उनमें से प्रत्येक के साथ रखने चाहिए। अगर वे इसका सहर्ष प्रत्युत्तर दें तो ठीक, वरना भारत जवाब देने की स्थिति में तो है ही।

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