Is administration and police successful in preventing communalism what should be there

 

हाल के समय में सांप्रदायिक दंगों या टकरावों का सिलसिला एकदम प्रत्याशित तरीके से घटित हो रहा है. हम सब जैसे यह मानकर चलते हैं कि हिंदुओं का अमुक त्योहार आएगा, तो अमुक शहर का अमुक इलाका ‘संवेदनशील’ हो जाएगा. मुसलमानों का अमुक पर्व आएगा, तो अमुक इलाका ‘दंगा-संभावित’ हो जाएगा. ध्यान से देखें तो पता चलता है कि इसका एक पैटर्न बनता जा रहा है जिसमें मौटे तौर पर तीन पक्षों की सक्रियता नज़र आती है –

  • पहला पक्ष है उन्मादी और भड़काऊ वातावरण बनाने वाले सांप्रदायिक समूह, जिसके असली सूत्रधार भोले और जोशीले युवाओं को हिंसा में झोंककर स्वयं छिप जाते हैं.
  • दूसरा पक्ष है उकसावे के बाद भड़की हिंसा पर तात्कालिक रूप से किसी तरह काबू पाने वाली लाचार पुलिस, जिसपर कई बार राज्य सरकारों के इशारे पर काम करने का आरोप भी लगा दिया जाता है. और
  •  तीसरा पक्ष है राजनीतिक दलों का जो प्रायः बाद में इस हिंसा पर राजनीति करने के लिए अपने नफा-नुकसान के आधार पर कूद पड़ते हैं और इनके प्रवक्ता अपने तमतमाते तेवरों के साथ नाटकीय टीवी डिबेट्स की मनोरंजक तू-तू-मैं-मैं में तत्काल सक्रिय हो जाते हैं. यह सब इतना प्रत्याशित होता है कि डिबेट के संचालक से लेकर सभी दलीय प्रवक्ताओं और दर्शकों तक को यह पहले से मालूम होता है कि कौन क्या बोलने वाला है.

Where is Communal Harmony

इस पूरी परिघटना में जिस एक पक्ष की कमी हमें खलती है, वो है सांप्रदायिक सौहार्द्र और शांति कायम करने वाले सामाजिक समूहों और शांतिप्रिय नागरिकों की ज़मीनी सक्रियता. गांधी, विनोबा, बादशाह ख़ान और जेपी के दौर की तो बात ही जाने दें, उनके बहुत बाद तक अमनपसंद नागरिकों की ऐसी अनौपचारिक और औपचारिक शांति समितियां सक्रिय होती थीं. ऐसे नागरिक समूह सांप्रदायिक टकरावों की आशंका वाले इलाकों में दंगों से पहले और उसके दौरान भी फ्लैग-मार्च निकालते थे. ये लोग संबंधित समुदायों के साथ बैठक आयोजित कर संवाद करने और दिलों को जोड़नेवाले प्रयासों को बढ़ावा देने का कार्य बखूबी करते थे. विशेषकर गांधी-विचार और सर्वोदय परंपरा से जुड़े लोगों और संगठनों की इसमें सक्रिय भागीदारी होती थी.

दंगों के दौरान महात्मा गांधी के निर्भीक दौरों के इतिहास से हम सभी परिचित हैं. लेकिन दो अक्टूबर, 1969 को जब एक तरफ गांधीजी की जन्म शताब्दी मनाई जा रही थी, तो दूसरी तरफ गुजरात के अहमदाबाद में भयानक सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे. मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा करीब 700 का था. ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान जिन्हें हम बादशाह ख़ान और सीमांत गांधी के नाम से भी जानते हैं, उन्होंने गांधीजी की भांति ही दंगा प्रभावित क्षेत्रों में जाने का फैसला किया. वहां बेधड़क जाकर उन्होंने पीड़ितों को सांत्वना दी. आक्रमणकारियों को समझाने का काम किया. इसके बाद वे सेवाग्राम आश्रम पहुंचे जहां उनका स्वागत करने के लिए विनोबा भावे एक दिन पहले ही पहुंच गए थे.

शाम की प्रार्थना में विनोबा और बादशाह खान दोनों साथ-साथ गए. बाद में वहां जयप्रकाश नारायण भी पहुंच गए. क्या दुर्भाग्य था कि एक तरफ गांधीजी का शताब्दी वर्ष चल रहा था और दूसरी ओर भारत सांप्रदायिक उपद्रव मचा हुआ था. आठ नवंबर, 1969 को तीनों ने मिलकर एक संयुक्त वक्तव्य प्रकाशित किया, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं से अनुरोध किया गया कि ‘वे आगे आएं और जनता की सेवा द्वारा और जनता की शक्ति को संगठित करके देश की बिगड़ी हालत का मुकाबला करें.’ तब उनके इस सामूहिक वक्तव्य का व्यापक असर हुआ था.

इसके ठीक बीस साल बाद 1989 में जब बिहार के भागलपुर में भयंकर दंगे छिड़े, तब भी सर्वोदय, खादी, गांधी शांति प्रतिष्ठान, छात्र युवा संघर्ष वाहिनी और संपूर्ण क्रांति मंच के कार्यकर्ताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों तथा शिक्षकों के संघों, लोक-चेतना, सुंदरवती महिला कॉलेज की अध्यापिकाओं और अनेक संगठनों और असांप्रदायिक पुरुष-महिलाओं ने इस सांप्रदायिक पागलपन के खिलाफ अहिंसक संघर्ष किया था. खासकर युवाओं ने इसमें बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

ऐसे लोगों और संगठनों के हस्तक्षेप के बाद माहौल बदलते देर नहीं लगी. भागलपुर के पिठाना और देहरापुर के कई मुसलमानों ने अपनी जान जोखिम में डालकर हिंदुओं की जान बचाई. इसी तरह कई गांवों में हिंदुओं ने मुसलमानों के लिए आश्रय और भोजन का प्रबंध किया. सौहार्दता, प्रेम और भाईचारे का संदेश तेजी से फैला और पूरा माहौल ही बदल गया. यह केवल प्रशासन के बूते हो पाना संभव नहीं था, क्योंकि उस पर से तो दोनों ही पक्षों का भरोसा उठ चुका था.

Citizen and Eminent Personal have big role in spreading Communalism

Examples

  • भारत में सांप्रदायिक दंगों के इतिहास के एक प्रामाणिक अध्ययन में प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता शैलेश कुमार बंदोपाध्याय ने पाया है कि दंगों को रोकने में अक्सर ऐसे समूह और नागरिक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उदाहरण के लिए 30 अक्तूबर, 1990 को जब गुजरात के बड़ौदा और अन्य स्थानों पर दंगे शुरू हो गए, तो वरिष्ठ सर्वोदयी कार्यकर्ता और बड़ौदा से प्रकाशित साप्ताहिक ‘भूमिपुत्र’ पत्रिका के संपादक जगदीश शाह दो नवंबर, 1990 को अनशन पर बैठ गए. यह खबर पाकर शहर के मेयर और अन्य कई लोग भी अनशन में भाग लेने पहुंच गए. अनशन स्थल पर सुबह-शाम सर्वधर्म प्रार्थना होती रही जिसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों ही शामिल होते थे. इधर शहर के दंगाग्रस्त इलाकों में नागरिक सद्भावना का प्रचार चलता रहा. दंगा रुकने के बाद उन्होंने पांच नवंबर को अपना अनशन तोड़ने का फैसला किया. लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि कुछ इलाके अभी भी अशांत चल रहे हैं, वे फिर अनशन पर बैठ गए. आखिरकार सात नवंबर को बड़ौदा में एक विशाल शांति-सभा का आयोजन हुआ. राज्य के गृहमंत्री और उच्चाधिकारियों सहित हजारों लोगों ने अनशन-स्थल पर आकर शांति कायम रखने की प्रतिज्ञा की और तब जाकर जगदीशभाई ने अपना अनशन समाप्त किया.
  • ठीक इसी तरह बड़ौदा आर्ट कॉलेज के अध्यापक और भारत के सुप्रसिद्ध चित्रकार गुलाम मोहम्मद शेख ने सांप्रदायिक सद्भावना कायम करने के लिए 30 जनवरी, 1991 को गांधी हॉल के सामने चौक पर पूरे दिन का उपवास और सर्वधर्म प्रार्थना का आयोजन किया. बड़ी संख्या में आम जनता ने इसमें भाग लिया. गुजरात के बनासकांठा जिले में ऐसा ही कार्यक्रम ‘जय जगत इनसानी बिरादरी’ नाम की संस्था ने भी किया था. इन प्रयासों से वहां आपसी सद्भाव कायम करने में बड़ी सफलता मिली थी.
  • ऐसा ही एक उदाहरण दिसंबर 1990 में हुए अलीगढ़ दंगों के दौरान का भी है. दंगे के समय यह अफवाह फैलाई गई कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अस्पताल में हिन्दू रोगियों की हत्या की जा रही है. तब वहां के अध्यापक केपी सिंह ने अपनी जान हथेली पर रखकर लगातार कई दिनों तक कर्फ्यूग्रस्त इलाकों में हिन्दू और मुसलमान साथी कार्यकर्ताओं के साथ घर-घर जाकर इन अफवाहों का खंडन करना शुरू किया. इस प्रयास से दंगे की उत्तेजना में काफी कमी आई और सांप्रदायिक सद्भाव का वातावरण बन गया.
  • इसी तरह अलीगढ़ में ही ‘सोसाइटी फॉर सेक्यूलरिज़्म’ नाम की संस्था और इसकी पत्रिका के युवा संपादक अशोक चौहान ने अपने युवा साथियों के साथ मिलकर दंगों के बीच कर्फ्यूग्रस्त मुस्लिम इलाकों में जाकर वहां उचित कीमत पर रोजमर्रा के सामान पहुंचाने की व्यवस्था की और बीमार लोगों के लिए दवा भी मुहैया कराई. अलीगढ़ और आगरा विश्वविद्यालय के छात्रों ने ‘लाइफ इंडिया सोसायटी’ के नाम से एक संगठन बनाकर दोनों पक्षों के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए काम किया. (GSHINDI)
  • विनोबा ने युद्धों और दंगों को जड़मूल से समाप्त करने के लिए शांति-सैनिक की संकल्पना की थी और खासकर महिलाओं को इसमें आगे आने के लिए कहा था. अक्टूबर, 1990 में कुख्यात ‘रथयात्रा’ के दौरान जब इंदौर में दंगा छिड़ गया, तो सर्वोदय कार्यकर्ताओं द्वारा गठित शांति-सैनिकों ने अपने त्वरित प्रयासों से तत्काल ही इसपर काबू पा लिया था.
  • इंदौर का दौलतगंज इलाका इन दंगों से सबसे अधिक प्रभावित था. शांति-सैनिक वहां पहुंच गए और हिंदू-मुस्लिम दोनों ही समुदायों के कुछ खास नागरिकों के साथ संयुक्त रूप से प्रतिज्ञा ली की वे अपनी जान देकर भी दंगा रोकने की कोशिश करेंगे. (#GSHINDi, #TheCoreIAs)इसके बाद पचास शांति सैनिकों का एक दस्ता बना जिनमें आधे हिंदू थे और आधे मुसलमान. ये लोग सम्मिलित रूप से हर मोहल्ले में जाते और वहां के लोगों के साथ घुलमिल कर आत्मीय संबंध स्थापित करने का प्रयास करते. हिंदू-मुसलमानों का लगातार कई दिनों तक साथ-साथ रहने-सोने, खाने-पीने और घूमने से सहज आत्मीयता का भाव पैदा हुआ. धीरे-धीरे शांति-सैनिकों की संख्या में वृद्धि होने लगी. उन्होंने न केवल जन-संपर्क बल्कि जन-सेवा का कार्य भी शुरू कर दिया.
  • Read [email protected] GSHINDi Media की सुरक्षा और लोकतंत्र

What to be done?

देखा गया है कि दंगों का एक बड़ा कारण नागरिक जीवन में अलगावपन का अनुभव होना भी है. हिन्दू-मुसलमानों के सम्मिलित शांति सैनिकों ने इस अलगाव की भावना को (GSHINDI)एकदम कम कर दिया. यह प्रयोग इतना सफल रहा था कि दूरदर्शन ने इन शांति-सैनिकों के कार्यों का प्रसारण तक किया था.

ऐसे प्रयास छिटपुट रूप से आज भी होते होंगे, लेकिन जिस पैमाने पर सांप्रदायिक टकरावों में बढ़ोतरी हो रही है, उसे देखते हुए ऐसे प्रभावी प्रयास देखने-सुनने में नहीं आ रहे हैं. सोशल मीडिया पर लोग अवश्य ही चिंता, दुःख और हताशा जाहिर करते नज़र आते हैं, लेकिन उसी सोशल मीडिया के जरिए फैलाए जा रही अफवाहें कहीं ज्यादा हावी नजर आते हैं. हिंदुओं और मुसलमानों की नई पीढ़ियों का बड़ा हिस्सा अभी भी अमनपसंद और असांप्रदायिक है. यदि ये युवक केवल सोशल मीडिया पर अपनी चिंता जाहिर कर ही अपनी जिम्मेदारियों की इति समझ लेंगे, तो उससे ये टकराव और दंगे रुकने से रहे.

जरूरी है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय से लेकर नागरिक संगठनों तक के स्तर पर दोनों समुदायों के युवक-युवतियां सम्मिलित रूप से शांति-सैनिकों का सक्रिय समूह बनाएं. वे सोशल मीडिया का भी सक्रिय इस्तेमाल करें, लेकिन ज्यादा जरूरी होगा कि ऐसे पर्व-त्योहारों से कुछ दिनों पहले से ही ये शांति-सैनिक अपने-अपने गांव-मोहल्लों में सक्रिय हो जाएं. सघन जन-संपर्क और मन-संपर्क का अभियान चलाकर सांप्रदायिक सद्भाव का वातावरण तैयार करने लगें. जुलूसों और कार्यक्रमों की रूपरेखा और मार्ग-चयन की योजना में भी सकारात्मक हस्तक्षेप करें. कार्यक्रमों के स्वरूप और नारों को उत्तेजक न बनने दें. सांप्रदायिक भावना भड़काने वाले राजनीतिक संगठनों के प्रति लोगों को पहले से सचेत करने के लिए घर-घर जाकर समझाएं. सम्मिलित टीम बनाकर नुक्कड़ नाटकों, खेलों, गायन, सर्वधर्म-प्रार्थना और मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा सकता है. (GSHINDI)

हमारी अमनपसंद नई पीढ़ी को मार्टिन लूथर किंग जूनियर की यह बात हमेशा याद रखनी होगी जो उन्होंने ऐसे ही संदर्भों में कही थी- ‘इतिहास इस बात को दर्ज करेगा कि सामाजिक संक्रमण के इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी बुरे लोगों का कानफोड़ू शोर-शराबा या उनकी हिंसा नहीं थी, बल्कि इससे भी बड़ी त्रासदी थी अच्छे लोगों की भयावह चुप्पी और उदासीनता.’

#Satyagriha

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