आत्महत्याओं की अनदेखी

प्रसंग:

  • आत्महत्या के इर्द-गिर्द चुप्पी की संस्कृति रची गई है, जबकि यह सामूहिक स्वास्थ्य से जुड़ा गम्भीर मसला है। इसके चलते देश में तेजी से बढ़ते इस संकट की अनदेखी कर दी जाती है।

तथ्य:

  • वर्ष 2021 में, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने देश में आत्महत्याओं के 164,033 मामले दर्ज किए थे। पिछले एक दशक से इस तरह के मामलों में नियमित बढ़ोतरी हो रही है।
  • जब भी कोई व्यक्ति आत्महत्या से अपने जीवन का अंत करता है तो उससे जुड़े कम से कम 60 मित्रों-प्रियजनों पर इसका असर पड़ता है और इनमें से 20 से अधिक ऐसे होते हैं, जो खुद आत्महत्या का प्रयास करते हैं।
  • वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि बहुत सारे ऐसे मामलों की तो रिपोर्ट तक नहीं की जाती।

आवश्यकता:

  • आत्महत्या की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं और मानसिक स्वास्थ्य-सेवाएं बहुसंख्य जनता के लिए दूर की कौड़ी बनी हुई हैं तो निवारण पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी हो गया है। चिंता की बात यह है कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुदान देने वालों के लिए भी आत्महत्या-निवारण अधिक मायने नहीं रखता।
  • ऐसे में इस दिशा में नीतिगत स्तर पर बदलाव करना आवश्यक होता है। समस्या को समझना उसे सुलझाने की दिशा में पहला कदम होता है। मारीवाला हेल्थ इनिशिएटिव में इस मुद्दे से सम्बन्धित पहला कदम था: रिसर्च और इनसाइट-बिल्डिंग करना। इसी का परिणाम थी 2021 में जारीसुसाइड प्रिवेंशन : चेंजिंग नैरेटिवनामक रिपोर्ट, जिसका फोकस इस बात पर था कि आत्महत्याओं की रोकथाम के प्रयास कैसे होने चाहिए।
  • इस रिपोर्ट ने सुसाइड प्रिवेंशन के लिए दृष्टिकोण और परियोजनाओं की नींव रखी है। यह इस काम में निहित जटिलताओं को व्यक्त करती है, साथ ही यह भी बताती है कि इस दिशा में प्रयास शुरू करने से पहले संगठनों को किस प्रकार के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को विकसित करना चाहिए। यहां याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि आत्महत्या को एक व्यक्तिगत निर्णय की तरह देखा जाता है, ऐसी दुर्घटना की तरह नहीं जिसे टाला जा सकता था।
  • मीडिया में भी आत्महत्याओं की रिपोर्टिंग में सनसनी पर ही जोर दिया जाता है कि आत्महत्या की प्रणाली कैसी थी, या इन्हें महज आंकड़ों तक सीमित कर दिया जाता है। इस संकट का सामना करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है और हमारे पास इसके संसाधन भी हैं। आत्महत्या-निवारण के लिए मनो-सामाजिक रवैया सबसे जरूरी है। इसमें शामिल है काउंसलिंग आदि के जरिए मनोवैज्ञानिक समर्थन देना और रोजगार, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा जैसे सामाजिक लाभ मुहैया कराना।
  • 2021 में मानसिक स्वास्थ्य सूची (एमएचआई) ने एक एडवोकेसी किट लॉन्च करते हुए विभिन्न पार्टियों के संसद सदस्यों के साथ एक गोलमेज-वार्ता की थी और उनसे अनुरोध किया था कि स्वास्थ्य मंत्रालय के जरिए एक राष्ट्रीय आत्महत्या-निवारण नीति बनाने पर जोर दें।
  • इस पहल के बाद नवम्बर 2022 में भारत की पहली राष्ट्रीय आत्महत्या निवारण रणनीति जारी की गई। यह इस दिशा में काम कर रहे कार्यकर्ताओं, आंदोलनकारियों और सिविल सोसायटी सदस्यों की बड़ी जीत थी। एमएचआई के प्रयासों की परिणति जी20 में सबमिट किए गए सी20 पॉलिसी पैक में इन दोनों बिंदुओं के समावेश के साथ हुई है।

निष्कर्ष:

  • भारत के लिए आत्महत्याओं की रोकथाम को अपनी प्राथमिकता बनाने का समय गया है। उत्तम मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की समस्या को सामने रखना बहुत ज़रूरी है।
  • विडम्बना ही है कि आत्महत्याओं को ऐसी सामाजिक समस्या की तरह नहीं देखा जाता, जिसे सरकारों, स्वास्थ्य-तंत्रों, कार्यस्थलों, नॉन-प्रॉफिट संस्थाओं, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े पेशेवरों और समाज द्वारा मिलकर सुलझाना हो।

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