पर्यावरणीय मूल्यों की आवश्यकता

आवश्यकता क्यों?

  • भारत की पर्यावरणीय समस्याओं के लिए महज ग्लोबल वार्मिंग को उत्तरदायी मान लेना बिल्कुल गलत होगा। उत्तर भारतीय शहरों में तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण, अनियोजित सड़कों बांधों की वजह से हिमालय क्षेत्र में मची तबाही, भूजल का ज्यादा उपयोग, मिट्टी में रसायनों का बढ़ता असर, जैव विविधता की हानि, ये सभी कारक जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं।
  • समस्या की जड़ आधुनिक मनुष्य के विचारों में है, जिसके तहत वह खुद को प्रकृति पर पूर्ण अधिकार, मनचाहे उपयोग या दुरुपयोग और उसे अपने अधीन मानने की सर्वोच्च शक्ति देता है। प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने के इसी विचार का नतीजा आज बढ़ती आबादी, शहरी भीड़भाड़, प्राकृतिक संसाधनों की कमी, मशीनों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण का नाश और मानसिक बीमारियों में बेतहाशा वृद्धि के रूप में दिखता है।
  • प्रकृति पर प्रभुत्व और उसे एक भौतिक इकाई मानने की भावना आधुनिक मनुष्य में घर कर गई है। जब यह भावना मनुष्य के लालच वासना से जुड़ती है, तो पर्यावरण पर दबाव ज्यादा बढ़ जाता है। चीजों के उपभोग की एक सीमा होती है। लेकिन उन्हें बगैर किसी सीमा के अनंत संभावनाओं वाला समझने की सोच सबसे पहले अमेरिका में फैली।
  • मनुष्य की असीमित शक्ति और संभावनाओं को लेकर फैली इस गलत सोच को विकास अर्थशास्त्र ने भी बढ़ावा दिया, जिसमें मनुष्य को पूरी तरह से भौतिक जरूरतों वाला प्राणी माना गया है। आधुनिक विज्ञान और अर्थशास्त्र ने मनुष्य को आध्यात्मिक नैतिक संयम से दूर कर दिया है। इसी वजह से मनुष्य प्रकृति को उपभोग की वस्तु मानते हुए, उसके प्रति किसी तरह की जिम्मेदारी महसूस नहीं करता।
  • आधुनिक पश्चिम में धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद और सांसारिक मनुष्य के अधिकतम उपभोग के विचारों का मनुष्य और प्रकृति के इतिहासों पर गंभीर असर दिखा।
  • यह नजरिया आज के तकनीकी मनुष्य की धारणाओं के विपरीत है, जो मानते हैं कि जलवायु संकट को सौर, हाइड्रोजन और पवन जैसे नए ऊर्जा स्रोतों, इलेक्ट्रिक कारों, कार्बन कैप्चर और भू-इंजीनियरिंग द्वारा हल किया जा सकता है। हाल ही में तकनीकी क्षेत्र के कुछ शीर्ष अरबपतियों द्वारा समर्थित पुस्तक क्लाइमेट कैपिटलिज्म में ऐसे नवाचारों की बात की गई है, जो 'दुनिया की प्रमुख आर्थिक प्रणाली (अर्थात, पूंजीवाद) के भीतर ही विकास की गति को कम किए बगैर जलवायु समस्याओं का समाधान दे सकते हैं।'

निष्कर्ष:

  • शोधकर्ता जलवायु संकट के पीछे की प्रमुख वजह खराब तकनीकों को नहीं, बल्कि खराब विचारों को बताते हैं। जो अरबपति हैं, वे अपने निजी विमानों, निजी जहाजों और कई महाद्वीपों में स्थित अपने तमाम घरों की सुविधा के साथ जलवायु संकट का हल खोजना चाहते हैं। दूसरी ओर, एक ही धर्म कुछ लोगों को धैर्य और सहिष्णुता सिखाता है, वहीं दूसरे लोग उसी धर्म की व्याख्या हिंसा युद्ध को फैलाने के लिए कर रहे हैं।
  • परंपरागत तौर पर धार्मिक हुए बगैर भी प्रकृति के प्रति सम्मान और संसाधनों के उपयोग में संयम का विकास किया जा सकता है। दरअसल, जलवायु संकट से निपटने के लिए संस्थागत बदलाव जरूरी हैं। इसके अलावा, एक विकेंद्रीकृत, ज्यादा पारदर्शी लोकतांत्रिक शासन भी समय की मांग है। ऐसी राजनीतिक व्यवस्था, जिसमें कोयला पेट्रोकैमिकल क्षेत्र के दिग्गज यह निर्धारित करें कि चुनाव कैसे लड़े और जीते जाएंगे, सत्तारूढ़ दल को किन नीतियों को आगे बढ़ाना चाहिए, मीडिया को क्या रिपोर्ट करना चाहिए, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारियों के बिल्कुल विपरीत है।

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