सार्वजनिक बैंकों के लिए आगे की डगर (Future course for public banks)

 

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का मनोबल गिरा हुआ है। उन्हें सीबीआई, सीवीसी, सीएजी और सीआईसी जैसी संस्थाओं का डर सता रहा है। उनके पास इक्विटी पूंजी की कमी है। उनका कंपनियों को ऋण देने का कारोबार समस्याओं से घिरा हुआ है।

सार्वजनिक बैंकों को बकाया कर्ज के भुगतान में चूक करने वाले कर्जदारों के साथ क्या तरीका अपनाना चाहिए? उन्हें भविष्य में कंपनियों को ऋण देते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

Is Privatisation solution

भारत को दीर्घावधि में अपने सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। हालांकि ऐसा निकट भविष्य में नहीं होने वाला है। एक विशाल निजी बैंकिंग प्रणाली होने की पूर्व-शर्त यह है कि बैंकिंग नियमन में राज्य की सक्षमता है। अगर किसी निजी बैंक का नियमन खराब है तो वह एक सार्वजनिक बैंक से भी बुरा है। नीति निर्माता इस पर अमल के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से उम्मीदें लगाए हुए हैं लेकिन वित्त मंत्रालय एवं रिजर्व बैंक की क्षमताओं को देखते हुए इसमें पांच से दस साल तक का वक्त लग जाएगा। इस परियोजना के पूरा नहीं होने तक पीएसयू बैंकों के निजीकरण की सलाह नहीं दी जा सकती है, भले ही ऐसा करना राजनीतिक रूप से सही हो।

अपनी हालत को देखते हुए हमें तीन बिंदुओं पर ध्यान देने की जरूरत है।

  • पहला, जहां सार्वजनिक बैंकों के पास इक्विटी पूंजी की किल्लत है वहीं उन्हें सरकार का समर्थन भी हासिल है। सार्वजनिक बैंकों के लिए कारोबार की कमी नहीं है। ग्राहक उन पर उसी तरह भरोसा करते हैं जिस तरह भारत सरकार पर विश्वास करते हैं। इन बैंकों को इस भरोसे के ही चलते ग्राहकों से मिलने वाले सस्ते जमा के तौर पर भारी सब्सिडी मिलती है। इससे सार्वजनिक बैंकों को अपनी गतिविधियों के लिए समय और स्थान दोनों मिल जाता है।
  • दूसरा, सार्वजनिक बैंकों की संगठनात्मक क्षमताएं काफी अलग तरह की हैं। भारतीय स्टेट बैंक का संचालन काफी बेहतर तरीके से होता है और वह निजी क्षेत्र के अधिकांश बैंकों से भी बेहतर है। दूसरी तरफ बहुत खराब ढंग से संचालित हो रहे सार्वजनिक बैंक भी हैं। बाजार पूंजीकरण अनुपात वाली कुल परिसंपत्ति एसबीआई के लिए जहां 12 गुना है तो कॉर्पोरेशन बैंक या यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के लिए यह 71 गुना है। हमें कोई भी समाधान सुझाते समय इस विविधता को ध्यान में रखने की जरूरत है।
  • तीसरा, सार्वजनिक बैंकों की तरफ से कंपनियों को दिए गए ऋण के बकाया पर काफी ध्यान दिया जा रहा है लेकिन ये आंकड़े पुराने कर्ज के भुगतान और नए कर्ज के आवंटन के चक्र से निर्धारित होते हैं। नए कर्जों के आवंटन को लेकर फैसले हमेशा किए जाते हैं। सार्वजनिक बैंकों का कॉर्पोरेट ऋण वितरण इस कदर बाधित नहीं होना चाहिए कि नए ऋण बांटे ही न जाएं। एक-चौथाई सूचीबद्ध गैर-वित्तीय फर्मों का ब्याज कवर अनुपात 1.5 होने से उनकी हालत खस्ता है लेकिन शीर्ष की एक-चौथाई फर्मों का ब्याज कवर अनुपात 13 होने से उनकी बढिय़ा हालत है। सार्वजनिक बैंकों को बेहतर हालत में नजर आ रही कंपनियों को कर्ज देने में खुशी होनी चाहिए।

हमें तत्काल कदम की जरूरत वाले बड़े सवालों पर गौर करना चाहिए। भुगतान में चूक करने वाले कर्जदारों के साथ क्या किया जाए? इसी तरह भुगतान में चूक न करने वाले कर्जदारों के साथ क्या बर्ताव होना चाहिए? कर्ज बांटने का फैसला किस तरह किया जाए? चूककर्ता कर्जदारों के मामले में लेनदार बैंक को ऋणशोधन एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत गठित होने वाली ऋणदाताओं की समिति में सोचसमझ कर कदम उठाने की जरूरत है। मसलन, हाल ही में एक सार्वजनिक बैंक के प्रतिनिधि ने ऋणदाताओं की समिति में रखे गए एक कर्ज समाधान योजना के पक्ष में राय दी थी लेकिन बाद में वह बैंक उस फैसले से पीछे हट गया। इसके चलते दिवालिया प्रक्रिया की समयसीमा का पालन करना मुश्किल हो गया।

  • सरकारी एजेंसियों सीबीआई, सीवीसी और सीएजी की कार्य प्रक्रियाओं में भी ऐसे बदलाव करने जरूरी हैं कि एक सार्वजनिक बैंक को अधिक कारगर बनाया जा सके।
  • निम्न क्षमता वाले सार्वजनिक बैंक के लिए रास्ता यह है कि वह अपने बकाया कर्ज को खुली नीलामी के जरिये बेच सके। इसके लिए परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) के विशेष दर्जे को खत्म करना जरूरी होगा ताकि कोई भी वित्तीय निवेशक इन परिसंपत्तियों की खरीद के लिए समान स्तर पर बोली लगा सके।
  • निजी इक्विटी फंड और ऋणग्रस्त परिसंपत्ति फंडों का एक बड़ा पूल होना चाहिए जो इन बॉन्ड या बकाया कर्जों की खरीद में प्रतिस्पद्र्धा कर सकें। इससे सार्वजनिक बैंकों की मूल्य वसूली बेहतर हो सकेगी।

अब सवाल उठता है कि उन कंपनियों के संदर्भ में बैंकों की क्या नीति हो जिन्होंने कर्ज भुगतान में कोई चूक नहीं की हो?

 इस मामले में बैंक बेहतर कर्जों को बनाए रखे और खराब नजर आ रहे कर्जों को बेच दे। ऐसा विवेकाधिकार की कम जरूरत वाली निर्णय प्रणाली के जरिये किया जाना चाहिए। इसके लिए कंपनियों के खाते संबंधी आंकड़ों के आधार पर नियम बना देने चाहिए जिससे कर्ज लेने वालों को सशक्त एवं अशक्त श्रेणी में बांटा जा सके। इसके पीछे का मूल विचार काफी सरल है। कमजोर फर्म निवेश के लिए तगड़ा कर्ज उठाते हैं जबकि उनकी मुनाफा कमाने की क्षमता कम होती है।

बेहतर कार्य कर रहे सार्वजनिक बैंकों में लेखा संबंधी आंकड़ों के आधार पर विस्तृत एवं वस्तुनिष्ठ ऋण विश्लेषण की लंबी परंपरा रही है। रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय बढिय़ा प्रक्रियागत डिजाइन को अधिक वैधता देकर इस प्रक्रिया को अपना समर्थन दे सकते हैं। हालांकि वित्तीय सेवा विभाग और रिजर्व बैंक के लिए बैंकों के बीच उनकी संगठनात्मक क्षमताओं के आधार पर विभेद कर पाना काफी मुश्किल होगा। आखिरकार, सार्वजनिक बैंक बढ़ती हुई मात्रा में ऋण आवंटन किस तरह करें? इसके लिए बैंकों को ऋण आवंटन में विवेकाधिकार का इस्तेमाल कम करने की प्रणाली विकसित करनी चाहिए जिसमें ऋण देने के पहले कंपनियों के वित्तीय खातों की सही तरह पड़ताल की जाए। जैसे ही कर्ज लेने वाली कंपनी एक खास स्तर से नीचे गिरे, सार्वजनिक बैंक को वह कर्ज बेच देना चाहिए।

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सार्वजनिक बैंक अभी कुछ समय तक बने रहेंगे लिहाजा हमें उन्हें बेहतर कामकाजी बैंक बनाना होगा। इन बैंकों के लिए निर्णय निर्माण का एक अधिक फॉर्मूलाबद्ध तरीका अपनाना बेहतर होगा और अच्छा प्रदर्शन कर रहे बैंकों की संगठनात्मक क्षमता का यह अहम हिस्सा रहा है। खराब संगठनात्मक क्षमता वाले सार्वजनिक बैंकों को ऊंचे जोखिम वाली कंपनियों को कर्ज देने के कारोबार से बाहर निकल जाना चाहिए। बढिय़ा प्रदर्शन करने वाले सार्वजनिक बैंकों के लिए कमजोर कर्जदारों को कर्ज देना और दिवालिया प्रक्रिया के जरिये उसे निकालने की कोशिश करना व्यवहार्य है। हमें कमजोर भुगतान क्षमता रखने वाली कंपनियों की पहचान के लिए सुस्पष्ट नियम बनाने चाहिए। हमें एआरसी का विशेष दर्जा खत्म कर देना चाहिए और कमजोर कंपनियों के कर्ज या बॉन्ड रखने वाले निजी फंडों का एक विशाल एकीकृत पूल बनाना चाहिए और दिवालिया प्रक्रिया में दबदबा कायम करने की कोशिश करनी चाहिए

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